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उपन्यास >> सुमति सुमतिगुरुदत्त
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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।
कुछ दिन हुए मैं सिनेमा देखने के लिए गया था। वहाँ मुझे इनके दर्शन हो गए। मैं समझ गया कि मेरा भाग्य आपके साथ नहीं इनके साथ बँधा हुआ है। यही सोचकर कल सायंकाल मैंने इनसे विवाह कर लिया है।’’
‘‘रात के हवाई जहाज़ से मैंने बम्बई के लिए अपनी सीटें रिज़र्व करवा रखी है। आप सब लोगों का मैं बहुत आभारी हूँ। परन्तु भाग्य की गति को तो कोई नहीं रोक सकता।’’
इन नए रहस्योद्घाटन से निष्ठा निश्चल बैठी रही। अपने परिजनों द्वारा अपने साथ इस प्रकार षड्यंत्र रचने का अनुमान कर वह मन में दुःख अनुभव करती थी। किन्तु उसे स्मरण हो आया कि लक्ष्मण ने उसके मुख पर अंकित तेज की बात कही थी। इससे उसका दुःख प्रसन्नता में परिणित हो गया और वह समझने लगी कि उस तेज के सम्मुख कोई ठगी नहीं चल सकती है।
भोजनोपरान्त लक्ष्मण सेठ तो अपना सामान उठाकर होटल के लिए चला तो नलिनी भी रघुवीर को लेकर सेठ के साथ ही चली गई।
जब वे लोग चले गए तो निष्ठा ने उस समय सुमति से सरोष पूछा. ‘‘भाभी! क्या आप भी इस षडयंत्र में सम्मिलित थीं?’’
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