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उपन्यास >> सुमति सुमतिगुरुदत्त
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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।
लक्ष्मण सेठ कमरे में आ गया था। उसने डॉ० सुदर्शन से पूछा, ‘‘आप इन्हें जानते हैं?’’
‘‘हाँ।’’
‘‘चलिए। डाइर्निगं-हाल में चलते हैं। मैं वही सब बातें बताऊँगा।’’
सब भोजन करने जा बैठे। वहाँ बैठे लक्ष्मण ने बताया, ‘‘ये श्रीमती नलिनी देवी, मेरी नव-विवाहिता पत्नी हैं। कल सायंकाल मैंने इनसे विवाह किया है।’’
‘‘देखिए निष्ठा देवी!’’ जब से वह इस घर में आया था आज पहली बार उसने इस प्रकार निष्ठा को सम्बोधित किया था–‘‘मैं अहमदाबाद नहीं, बम्बई का रहने वाला हूँ। आपकी बहन उषादेवी के पति हमारी एक मिल में मैनेजर है। पिछले वर्ष उनके घर पर मैं किसी काम से गया था तो वहाँ आपका चित्र देख आपसे विवाह करने की लालसा जाग पड़ी।
‘‘आपकी बहन के द्वारा मैंने प्रस्ताव भेजा तो उसके उत्तर में माँजी का एक लम्बा-चौड़ा पत्र आ गया। लगभग एक वर्ष तक मैं आपके विचारों पर मनन करता रहा और अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि स्वयं मिलकर आपको सन्मार्ग दिखाना चाहिए। आपको धर्माधर्म का सार बताना चाहिए।’’
‘‘पिछले दस दिन से मैं आपसे बात करने का यत्न कर रहा था परन्तु मैं सत्य कहता हूँ कि आपके मुख पर अंकित तेज देख मेरा मुख कभी खुला ही नहीं।’’
‘‘अन्त में मैंने निश्चय किया है कि तुमसे बहन का सम्बन्ध ही ठीक रहेगा। एक बहन के साध्वी होने में गौरव का अनुभव होता है। परन्तु पत्नी का साध्वी होना ठीक नहीं जँचा। इस कारण मैंने पत्नी कहीं अन्यत्र ढूँढ़ ली है।
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