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उपन्यास >> सुमति सुमतिगुरुदत्त
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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।
वे दोनों अभी तक वही खड़ी-खड़ी बातें कर रही थीं। निष्ठा ने कहा, ‘‘चलो, भीतर चलकर बैठें। यहाँ इन मूल्यवान वस्त्राभूषणों पर कहीं कोई नज़र न लगा दे। भाभी तो अन्दर ही हैं, किन्तु माताजी कहीं गई हुई है और रघुवीर स्कूल गया हुआ है।’’
दोनों सुमति के कमरे में जा पहुँची। सुमति अपने छोटे बच्चे को दूध पिला रही थी। यह देख नलिनी हंस पड़ी। सुमति इससे चौंकी और उस ओर देखने लगी। वह तो देखते ही पहचान गई। उसने कहा, ‘‘आओ नलिनी! मैं इसे छोड़ नहीं सकती, एक बार इसने दूध छोड़ा तो फिर यह पियेगा ही नहीं।’’
दोनों उसके खटोले के पास कुर्सियाँ डालकर बैठ गई। जब तक बच्चा दूध पीकर सो नहीं गया, तीनों चुपचाप बैठी रहीं।
जब वह सो गया तो सुमति उन दोनों को कमरें से बाहर ले गई। बाहर राधा खड़ी थी। सुमति ने उससे कहा, ‘‘सोम को मैंने दूध पिला दिया है। इस समय वह सो गया है। तुम उसका ध्यान रखना।’’
नलिनी ने पूछा, ‘‘तो क्या यह उसे दूध नहीं पिला सकती थी?’’
‘‘पिला तो सकती है, पर यह काम मैंने अपने लिए ही रखा हुआ है। बच्चों को तथा उसके पिता को मैं स्वयं खिलाती-पिलाती हूँ।’’
‘‘तीनों को एक ही श्रेणी में रख दिया है?’’
वे ड्रॉइंग-रूम में आ गई। सुमति ने नलिनी को बैठाया और बोली, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि मिस्टर ओझा से विवाह कर लिया है?’’
‘‘ओझा से? नहीं भाभी! एक वर्ष हो गया है, उसने तो घर से और दफ्तर दोनों से ही निकाल दिया था।’’
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