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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598
आईएसबीएन :9781613011331

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


‘‘क्यों निकाल दिया था?’’

‘‘उनका सुपुत्र मुझसे घनिष्ठता बढ़ाने लगा तो मैंने उससे कहा कि मैं तो उसकी माँ के स्थान पर हूँ। इससे वह चिढ़ गया और अपने पिता से मेरी झूठी शिकायत कर दी। बस फिर क्या था, बूढ़े ने उसी दिन मुझे घर से निकाल दिया और दूसरे दिन दफ्तर में जाकर, नौकरी से भी डिसमिस करवा दिया।

‘‘जीवन के वसन्त-काल में मैंने कुछ कमाकर रखा हुआ था। उसके आश्रय जीवन-यापन कर रही थी। कुछ दिन हुए मैं ओडियन सिनेमा गई हुई थी; वहाँ पर बम्बई के एक सेठ से परिचय हो गया। परिचय घनिष्ठता में बढ़ा और कल हमारा विवाह भी हो गया है। रात हम जनपथ होटल में रहे हैं। आज सायंकाल हवाई जहाज से हम बम्बई जा रहे हैं।’’

‘‘अपने पति को भी साथ ले आती?’’

‘‘मैंने उन्हें बताया ही नहीं कि मैं कहाँ जा रही हूँ। मैंने तो यह बताया था कि मेरा एक लड़का मेरे भाई के घर पर है। उन्होंने कहा कि बच्चे को लेकर सायं पाँच बजे तक मैं होटल में पहुँच जाऊँ। वे इस समय काम से मन्त्रालय गए हुए हैं।’’

‘‘क्या नाम है सेठजी का?’’ सुमित ने पूछा।

‘‘सौमित्र सिंघानी।’’

इतने में अपनी गाड़ी में कल्याणी लौट आई। वह चाँदनी चौक घण्टे वाले की दुकान से मिठाई लेकर आई थी। नलिनी को देख उसे भी विस्मय हुआ। नलिनी ने उसे भी अपने विवाह की बात बता दी। कल्याणी ने कहा, ‘‘यह तो ठीक है। परन्तु यदि कहीं खड़वे आ गया और उसने दावा कर दिया तो?’’

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