|
उपन्यास >> सुमति सुमतिगुरुदत्त
|
327 पाठक हैं |
||||||
बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।
समीप आकर जब नलिनी ने कहा ‘‘निष्ठा! पहचान नहीं?’’ तो निष्ठा उसका स्वर पहचान गई। वह तमककर उठी और बोली, ‘‘नलिनी! अरे!! यह तुमको क्या हो गया है?’’
‘‘मुझे तो वही हुआ है जो सबको हुआ करता है। परन्तु तुम यहाँ पर क्या कर रही हो?’’
‘‘मैं इन फूलों की शोभा देख रही हूँ।’’
‘‘सब व्यर्थ है। जीवन का सार केवल देखने में नहीं, उसे भोगने में है।’’
‘‘भोग ही तो रही हूँ। शरीर स्वस्थ, सबल और सुन्दर मिला है। शरीर की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए भोजन मिल जाता है। तन ढाँपने के लिए वस्त्र मिल जाते हैं। रहने के लिए यह सुन्दर स्थान मिला हुआ है, इसके अतिरिक्त और चाहिए क्या?’’
‘‘और पति?’’
‘‘इसकी अभी आवश्यकता अनुभव नहीं हुई। तुम अपनी बताओ। मैं तो कुछ ऐसा देख रही हूँ कि अमेरिका के रॉकफेलर’ की उत्तराधिकारिणी बन गई हो।’’
‘‘उत्तराधिकारिणी नहीं, बम्बई के एक करोड़पति की पत्नी?’’
‘‘बहुत-बहुत बधाई।’’
‘‘इस बधाई के लिए मैं तुम्हारा धन्यवाद करती हूँ। माताजी आदि कहाँ हैं? मैं उनका भी धन्यवाद करने के लिए आई हूँ। पाँच वर्ष तक उन्होंने रघुवीर की रक्षा और पालन-पोषण किया।’’
|
|||||










