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उपन्यास >> सुमति सुमतिगुरुदत्त
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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।
उस रात सुदर्शन और लक्ष्मण में बातचीत हुई। लक्ष्मण ने कह दिया, ‘‘डॉक्टर साहब! मैं ऐसी पत्नी चाहता हूँ जो मेरे व्यवसाय में मेरे कन्धे-से-कन्धे लगाकर मेरा सहयोग दे सके। हमारे घर में मेहमान आते रहते हैं और घर में गृहिणी ऐसी चाहिए जो उसने हँस-हँसकर बात कर सके। उनको साथ ले जाकर बम्बई और हिन्दुस्तान की सैर करा सके। यह आपकी बहन तो किसी साधु आश्रम की निवासी हो सकती है, हमारे घर में ऐसी पत्नी के लिए स्थान नहीं।’’
अगले दिन लक्ष्मण गया तो फिर रात को लौटकर नहीं आया। तीसरे दिन वह प्रातःकाल आकर प्रो०, सुदर्शन और उनकी माताजी को बता गया कि वह सायंकाल अपना सामान लेने आएगा।
उस दिन भी निष्ठा अपनी दिनचर्या में लीन थी और वह सुन ही नहीं रही थी कि लक्ष्मण उसके भाई से क्या कह रहा है।
मध्याह्नोत्तर वह कोठी के बाहर लान में बैठी फूलों की क्यारियों की शोभा देख रही थी कि उसका ध्यान भंग हुआ जब कोठी में एक अपरिचित मोटर गाड़ी ने प्रवेश किया। मोटर गाड़ी में नलिनी थी। नलिनी ने अपने सिर के बाल कटवा दिए थे। उनका परिधान रेशमी था। उसके हाथों में सोने की बीस-बीस चूड़ियाँ थीं। उँगलियों में दो-दो मुद्रिकाएँ और कानों में कर्णफूल तथा साड़ी पर हीरक-जड़ित पिन लगा हुआ था। वह आई भी थी बड़ी पैंतालीस हज़ार रुपए वाली शेवरलेट कार में। निष्ठा कोठी के लान में बेंत की कुर्सी पर बैठी सामने फूलों की क्लारी को देख रही थी। इतने में वह शानदार मोटर कोठी में घुसकर रुकी और उसमें से एक शानदार औरत निकलकर उसकी ओर आती दिखाई दी। मोटर को देखकर निष्ठा का ध्यान भंग हुआ और उस सुसज्जित महिला को अपनी ओर आते देख उसे विस्मय हुआ। वह पहचान नहीं सकी कि वह कौन है और अनुमान भी नहीं लगा सकी कि उसके पास किसलिए आ रही है।
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