आंख की किरकिरी - रबीन्द्रनाथ टैगोर Aankh Ki Kirkiri - Hindi book by - Rabindranath Tagore
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आंख की किरकिरी

रबीन्द्रनाथ टैगोर


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :55
मुखपृष्ठ : ebook
पुस्तक क्रमांक : 3984
आईएसबीएन :9781613015643

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नोबेल पुरस्कार प्राप्त रचनाकार की कलम का कमाल-एक अनूठी रचना.....

25

उस दिन फागुन की पहली बसंती बयार बह आई। बड़े दिनों के बाद आशा शाम को छत पर चटाई बिछा कर बैठी। मद्धिम रोशनी में एक मासिक पत्रिका में छपी हुई एक धारावाहिक कहानी पढ़ने लगी। एक जगह जब कहानी का नायक काफी दिनों बाद पूजा की छुट्टी में अपने घर लौट रहा था कि डकैतों के चंगुल में फँस गया। आशा का दिल धड़क उठा। इधर ठीक उसी समय नायिका सपना देख कर रोती हुई जग पड़ी। आशा के आँसू रोके न रुके। वह कहानियों की बड़ी उदार समालोचक थी। जो भी कहानी पढ़ती, वह उसे अच्छी लगती। विनोदिनी को बुला कर कहती, 'भई आँख की किरकिरी, मेरे सिर की कसम रही, इस कहानी को पढ़ देखना। ऐसी ही है! पढ़ कर रोते-रोते बेदम!'

विनोदिनी की अच्छे-बुरे की कसौटी से आशा के उमंग, उत्साह को बड़ी चोट पहुँचती।

महेंद्र को वह कहानी पढ़ाने का निश्चय करके गीली आँखों से उसने पत्रिका बंद की। इतने में महेंद्र आ गया। महेंद्र बोला - 'छत पर अकेली किस भाग्यवान को याद कर रही हो?'

आशा नायक-नायिका की बात भूल गई। उनसे पूछा - 'आज तुम्हारी तबीयत कुछ खराब है क्या?'

महेंद्र - 'नहीं, तबीयत ठीक है।'

आशा - 'फिर तुम मन-ही-मन जो कुछ सोच रहे हो मुझे साफ-साफ बताओ।'

आशा के डिब्बे में से एक पान निकाल कर खाते हुए महेंद्र ने कहा - 'मैं यह सोच रहा था कि तुम्हारी बेचारी मौसी ने न जाने कब से तुम्हें नहीं देखा। अचानक ही एक दिन तुम वहाँ पहुँच जाओ तो वे कितनी खुश हो जाएँ।'

आशा ने कोई जवाब न दिया। उसकी ओर ताकती रही। वह समझ न सकी कि एकाएक फिर क्यों यह बात महेंद्र के मन में आई।

आशा को चुप देख कर महेंद्र ने पूछा - 'तुम्हारी जाने की इच्छा नहीं होती क्या?'

इस बात का जवाब देना कठिन था। मौसी से मिलने की इच्छा भी होती है और महेंद्र को छोड़ कर जाने का दिल भी नहीं चाहता। आशा बोली-'कॉलेज की छुट्टियाँ होने पर जब तुम चलोगे तो मैं भी साथ चलूँगी।'

महेंद्र - 'छुट्टियों में भी जाने की गुंजाइश नहीं है। इम्तहान की तैयारी करनी है।'

आशा - 'फिर रहने दो। न ही गई तो क्या?'

महेंद्र - 'रहने क्यों दे? तुमने जाना चाहा था, जाओ!'

आशा - 'नहीं, मेरी इच्छा जाने की नहीं है।'

महेंद्र - 'अभी-अभी उस दिन तो ऐसी जबरदस्त इच्छा थी और अचानक ही वह इच्छा गायब हो गई!'

आशा नजर झुकाए बैठी रही।

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