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कहानी संग्रह >> 27 श्रेष्ठ कहानियाँ 27 श्रेष्ठ कहानियाँचन्द्रगुप्त विद्यालंकार
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स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ आरंभिक वर्षों की कहानियाँ
तथागत ने कहा-''जो उद्धत है, असंयत है, वह खड़ा होकर भी चंचल है। जो उदात्त
है, वह संयत चलते हुए भी अविचल है।''
तथागत की मार्मिक वाणी से उस प्रसुप्त मानव की मानसिक मूर्च्छा प्रेतबाधा
की तरह दूर हो गई। दुर्दान्त दस्यु के भीतर तिरोहित तक्षशिला
का शीलवान, प्रज्ञावान भाणवक जाग उठा। उसकी आंखों के सामने अतीत चलचित्र
की तरह घूम गया। उसे अपनी वर्तमान प्रवत्ति से आत्मग्लानि होने लगी। उसने
अनुभव किया-''मेरी शिक्षा का शुभारम्भ अब हो रहा है!''
हथियार फेंक कर वह अपने नए शास्ता तथागत के चरणों में प्रणत हो गया।
करुणामय ने अपनी शरण में ले लेने के लिए बाहें फैला कर उसे आहूत किया-''आ,
भिक्षु!'' यह नवीन सम्बोधन ही उसका संन्यास हो गया। अब वह अंशुमाल था।
अंगुलिमाल ने उनकी पदधूलि मस्तक से लगा कर कहा-''मैं तथागत के चरणों का
चिर-अनुगत रहूंगा।
अंगुलिमाल ने पश्चात्ताप और कृतज्ञता से विगलित होकर कहा-''भगवन, मेरे
पापों का क्या प्रायश्चित्त है? यह अधम आप के प्रति भी दुर्विनीत हो गया
था।''
तथागत ने कहा-''वत्स, तेरा पश्चात्ताप ही तेरा प्रायश्चित्त है। अब तू
किसी के द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर भी प्रतिकार मत करना, प्रतिशोध मत
लेना। हिंसा के बाद अब तू प्रतिहिंसा से भी विरक्त हो जा।''
अंगुलिमाल को अपना अनुगामी श्रमण बना कर तथागत जेतवन लौट आए।
कोशल नरेश प्रसेनजित प्रजा की पुकार से विवश होकर पांच सौ घुड़सवारों के
साथ अंगुलिमाल का दमन करने के लिए स्वयं श्रावस्ती से प्रस्थान कर रहा था।
तथागत का आशीर्वाद पाने के लिए वह अकेले पहले जेतवन में गया। उसे उदास देख
कर तथागत ने पूछा-''राजद, इतने चिन्तित क्यों हो? क्या किसी राजा ने
तुम्हारे ऊपर धावा बोल दिया है?
प्रसेनजित ने कहा-''भन्ते! किसी राजा ने नहीं, डाकू अंगुलिमाल ने मेरे
सारे राज्य को संकट में डाल रखा है। मैं उसी का निवारण करने जा रहा हूं।
आपका आशीर्वाद चाहिए।''
तथागत ने मुसकराकर कहा-''राजन्, यदि अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन हो गया
हो-वह एकाहारी ब्रह्मचारी अहिंसक परिव्राजक हो गया हो, तो आप उसके साथ
कैसा व्यवहार करेंगे?''
प्रसेनजित ने कहा-''भन्ते! हम प्रत्युत्थान करेंगे, आसन के लिए निमन्त्रित
करेंगे, संन्यास के उपकरण प्रदान करेंगे, सब तरह से रक्षा करेंगे! किन्तु
उस दुःशील पापी से क्या शील-संयम सम्भव है?''
अंगुलिमाल तथागत से थोड़ी दूर पर बैठा हुआ था। तथागत ने उसकी दाहिनी बांह
पकड़कर राजा के सामने उपस्थित करते हुए कहा-''राजन्, यह है तुम्हारा
अपराधी-अंगुलिमाल!''
इस आकस्मिक संवाद से प्रसेनजित सिर से पैर तक कांप उठा। उसे चकित और
रोमांचित देखकर तथागत ने ढाढ़स दिया-''राजन् डरो मत, इस आतंककारी में अब
कोई डंक नहीं है। एक बार इसे भर आंख देखो तो सही।''
प्रसेनजित ने आश्वस्त होकर ध्यान से देखा-ग्रीष्म का प्रचण्ड मार्तण्ड
शिशिर का सुकोमल आतप हो गया है।
सम्मानपूर्वक खड़े होकर राजा ने अंगुलिमाल का सांजलि अभिवादन किया। उस नूतन
ब्रह्मचारी ने अपनी सौम्य दृष्टि से राजा को अभिषिक्त कर आशीर्वाद
दिया-''तथागत के चरणों में सबका कल्याण हो।''
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