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देवकांता संतति भाग 6

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2057
आईएसबीएन :0000000

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चंद्रकांता संतति के आधार पर लिखा गया विकास विजय सीरीज का उपन्यास...

 

छठा बयान


उस वक्त मैं कोई पंद्रह साल का था, जब मुझसे एक पाप हो गया था। इस पाप की सजा मैं आज तक भुगत रहा हूं। वह पाप करने के बाद मैंने कसम खाई थी कि मैं अपनी बाकी जिंदगी नेकनीयती से गुजारूंगा। किसी को भी नाजायज ढंग से नहीं दबाऊंगा। कभी किसी गरीब को नहीं सताऊंगा। कभी किसी तरह का कोई पाप नहीं करूंगा। जब तक मेरे जिस्म में प्राण रहेंगे, तब तक मैं गद्दार, पापी, झूठे और मक्कार लोगों का दुश्मन और नेक, सच्चे और ईमानदार आदमी का हमदर्द और दोस्त बनकर रहूंगा। हां, उस पाप का प्रायश्चित करने के लिए मैंने यही कसम खाई थी। उस उम्र से आज तक जबकि मेरी उम्र पचपन साल की हो गई है, मैं अपनी उस कसम को निभाता चला आया था।

मगर अब - मैं जिंदगी के एक ऐसे दोराहे पर आ गया हूं कि एक पापी का पाप जानते हुए भी मैं उसकी खिलाफत और सच्चे आदमी का पक्ष नहीं ले सकता। क्योंकि वह झूठा, चालाक और दगाबाज इंसान मेरे उस पाप को जानता है.. जो मैंने पंद्रह साल की उम्र में किया था और यह मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि अगर मैंने उसका भेद खोला तो वह मेरे उस पाप को खोल देगा, जिसे मैं आज तक छुपाना चाहता हूं।

मैं उसके पापों को खोलने की हिम्मत न करके यहां लिख रहा हूं. ताकि मेरे बाद उस धूर्त आदमी का भेद खुल सके। इस कागज के पीछे मैंने आलपिन से एक और कागज जोड़ रखा है.. आप उसे पढ़ लें तो उस आदमी का प्रमाण सहित नाम आपको मिल जाएगा।

जो पहला कागज रामरतन और चंद्रप्रभा ने पढ़ा, उसका मजमून उपरोक्त था। मजमून के नीचे बंसीलाल के दस्तखत थे। यह कागज पढ़ने के बाद रामरतन और चंद्रप्रभा की नजरें मिलीं और फिर आलपिन से जुड़ा उसके साथ का दूसरा कागज पढ़ने लगे। वह कोई खत था और लिखाई भी बंसीलाल से एकदम अलग थी। दोनों कागजों की स्याही भी मेल नहीं खाती थी। लिखा था-

प्यारे दलीपसिंह जी,

मैं ये खत बंसीलाल नामक अपने ऐयार के हाथ आपके पास भिजवा रहा हूं। बंसीलाल मेरा बहुत ही विश्वासी ऐयार है। आपके लिए लिखा गया यह मेरा पहला ही खत है। और इसके जरिए से मैं आपकी कुछ मदद चाहता हूं। मैं, यानी मेघराज.. यहां उमादत्त का दारोगा और साला हूं। आपको तो मालूम होगा ही कि मेरी बहन कंचन की शादी राजा उमादत्त से हुई है। राजा उमादत्त ने मेरी काबलियत देखकर मुझे अपना दारोगा भी बना लिया है। मगर मैं बचपन से ही आपके साथ रहने के ख्वाब देखा करता हूं। इस खत में मैं अपना ज्यादा इरादा तो क्या लिखूं. हां, इतना ही लिख रहा हूं कि मैं राजा उमादत्त का नहीं, बल्कि आपका दोस्त वनना चाहता हूं। मैं आपकी मदद से अपना एक बहुत ही जरूरी काम निकालना चाहता हूं। मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि अगर आप उस काम में मेरी मदद करेंगे तो आपको भी बहुत फायदा होगा। मैं जानता हूं कि राजा उमादत्त से आपकी बहुत पुरानी खानदानी दुश्मनी है। मुझे डर है कि कहीं आप मेरी मदद करने से इंकार न कर दें। इसलिए मैं इस खत में इशारे के तौर पर इतना ही लिख रहा हूं कि उमादत्त के राज्य में मुझे अपना ही आदमी समझें।

- दारोगा मेघराज।

बस.. यह खत यहीं खत्म था। इसके पीछे उसी आलपिन में फंसा हुआ एक कागज और लग रहा था। रामरतन और चंद्रप्रभा ने जब पलटकर देखा तो वह बंसीलाल के हाथ का लिखा हुआ कागज था। उस पर लिखा था-

पढ़ा आपने दुष्ट दारोगा मेघराज का खत। यह तो आप समझ ही गए होंगे कि यह खत उसने मेरे हाथ दलीपसिंह के पास भिजवाया था।

अब आप कहेंगे कि उसने खत में मुझे अपना खास ऐयार कहा है तो फिर मैं उसके साथ यह दगा क्यों कर रहा हूं? मैं अपने हालात आपको संक्षेप में बताता हूं तभी आप समझ पाएंगे। एक नजर से देखा जाए तो यह बात बिल्कुल ठीक है कि मैं उसका ऐयार हूं। मगर मैं उसका किस तरह का खास ऐयार हूं - आप मेरा यह कागज अब पढ़कर समझ जाएंगे।

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