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देवकांता संतति भाग 2

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : राजा पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2053
आईएसबीएन :0000000

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चंद्रकांता संतति के आधार पर लिखा गया विकास विजय सीरीज का उपन्यास...

''नहीं!'' टमाटर को देखते ही पहला पिशाच चीख पड़ा-''ये नहीं हो सकता। और उसकी हालत बड़ी अजीब होने लगी। वह बुरी तरह घबरा रहा था। इतनी सर्दी में भी बदन पसीने से नहा गया। उसकी घबराहट इस हद तक बढ़ी कि वह एक चीख मारकर धरती पर गिरा तथा बेहोश हो गया। तब नवागन्तुक पिशाच ने मुस्कराकर टमाटर अपने बटुए में डाल लिया।

अचानक जमुना ने महसूस किया कि उसे नशा-सा छाता जा रहा है। सम्भलने की कोशिश करने के बाद भी वह स्वयं को सम्भाल न सकी और बेहोश होकर गिर गई। यह सब भी उसकी समझ में नहीं आया।

जब उसे होश आया तो उसे यह अनुमान भी नहीं था कि वह कितनी देर बेहोश रही। मगर होश आने पर उसने दोनों में से किसी भी पिशाच को वहां नहीं पाया। हां उसके पास ही एक लिखा हुआ कागज अवश्य पड़ा था। उसने कागज उठाया और चन्द्रमा की रोशनी में पढ़ा-

बेटी जमुना,

मेरे पास इतना समय भी नहीं कि तुझे घर छोड़कर आ सकूं। तू देख ही रही है कि दुश्मनों की ऐयारी कितनी जोर-शोर से चल रही है।

अगर मैं तुझे घर छोड़ने में समय लगाता तो उधर तेरी मां खतरे में घिर जाती। मैं तेरी मां को इन दुश्मनों के कब्जे से निकालकर घर पहुंचूंगा। तुझे मेरी आज्ञा है कि तू यहां से सीधी घर चली जा और मेरे वहां पहुंचने का इन्तजार कर।

- तेरा पिता पिशाचनाथ।

पत्र पढ़ने के कुछ देर बाद तक जमुना वहीं खड़ी कुछ सोचती रही और फिर पिता की आज्ञानुसार घर की राह ली। सारे रास्ते वह इन घटनाओं का मतलब समझने की कोशिश करती रही, किन्तु कुछ ठीक ढँग से समझ नहीं पाई। उस समय रात्रि का अंतिम पहर समाप्ति पर था जब वह घर पहुंची। सबसे पहले वह मां के कमरे में गई और यह देखकर वह भौचक्की रह गई कि उसकी मां रामकली आराम से बिस्तर पर पड़ी सो रही थी। यह देखकर जमुना के मस्तिष्क की जैसे सारी नसें हिल उठीं। उसने चकमक से चिराग जलाया। वह सोचने लगी कि कहीं उसके पिता उसकी मां को छुड़ा तो नहीं लाए हैं? किन्तु इतनी जल्दी यह विचार उसे असम्भव-सा लगा। अगर ये सच भी है तो उसके पिता को यहां होना चाहिए था। वह अपने किसी विचार पर दृढ़ न रह सकी।

उत्सुक होकर उसने अपनी मां को जगाया। वह आसानी से जाग गई और बोली-''अरे जमुना तू यहां इस समय?''

''मां - तू कब आई?'' जमुना ने प्रश्न किया।

''कहां से?'' जवाब में उसकी मां ने भी प्रश्न कर दिया-''ये तू क्या कह रही?''

''क्या तू यहीं सो रही है मां - तू कहीं गई नहीं थी? '' बुरी तरह उलझकर जमुना ने पुन: प्रश्न किया- ''तुझे तो कुछ लोग उठाकर ले गए थे। क्या तुझे पिताजी यहां नहीं लाए? मैंने अपनी आंखों से देखा था - मां कुछ लोग तेरी गठरी बनाकर...।''

और जो कुछ जमुना ने देखा, वह सब उसने मां को वता दिया।

सुनकर रामकली मुस्कराकर बोली-''मुझे लगता है जमुना कि तूने कोई बुरा सपना देखा है। मैं तो यहीं हूं - तीसरे पहर में मैंने उठकर पानी पिया थी और तू कहती है कि दूसरे पहर में ही कुछ लोग मुझे बेहोश करके गठरी में ले गए, जा आराम से जाकर सो जा, कोई खतरा नहीं है, तू अपने पिता से ऐयारी सीखती है न, इसलिए ऐसे-ऐसे सपने देखती है।'' कहने के बाद रामकली आराम से लेट गई। जमुना के आश्वर्य का कोई ठिकाना नहीं था। उसे लगा कि कहीं उसके पिता के दुश्मन किसी और को तो यहां उसकी मां के भेष में नहीं छोड़ गए हैं। उसे अपना यही विचार सही लगा और इसलिए वह बिना अधिक बात किए कमरे से बाहर निकल गई, परन्तु कमरे की दीवार की आड़ लगाकर वह वहीं खड़ी हो गई।

जमुना सावधानी के साथ जंगले के माध्यम से कमरे में झांक रही थी। एकाएक उसने देखा चारपाई के नीचे से एक आदमी निकला। जमुना उसकी सूरत न देख सकी, क्योंकि उसके चेहरे पर नकाब थी। रामकली ने रहस्यमय ढंग से उसके कान में कुछ कहा। रामकली ने उसके कान में क्या कहा, यह तो जमुना नहीं सुन सकी, किन्तु उसने देखा, सुनने के बाद नकाबपोश ने गरदन हिलाई और कमरे से बाहर की ओर आने लगा। जमुना एकदम दीवार से चिपक गई। वह नकाबपोश चौक में से गुजरा और चारदीवारी  के बाहर चला गया। जमुना ने उसका पीछा करने के लालच में दीवार फांदी, किन्तु यइ देखकर वह और भी सोच में पड़ गई कि वह  नकाबपोश उसे दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आ रहा था। निश्चय ही जमुना पुनः अपने कमरे में लौट आयी।

 

० ० ०

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