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देवकांता संतति भाग 7

वेद प्रकाश शर्मा

प्रकाशक : तुलसी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
पृष्ठ :348
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 2050
आईएसबीएन :0000000

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चंद्रकांता संतति के आधार पर लिखा गया विकास विजय सीरीज का उपन्यास...

कैसे मजबूर थे ये सब? इंग्लैंड की नाक - जेम्स बांड। चीन का सरताज - हुचांग! सर्वशक्तिमान माना जाने वाला टुम्बकटू! जासूस सम्राट बागारोफ! सारे के सारे जांबाज कितने मजबूर थे आज। उनका ही एक साथी उनकी आंखों के सामने मौत के मुंह में और वे कुछ भी नहीं कर सकते थे। बांड की नजर पागलपन करते बागारोफ पर पड़ी तो हुचांग से बोला-

''हुचांग, चचा को रोको।''

हुचांग बागारोफ के पास पहुंचा। अभी-अभी वह फिर एक बार बाग की घास पर गिरा था। मगर फिर भी उछलकर दीवार पर चढ़ जाना चाहता था कि हुचांग ने उसे पकड़ लिया था और फिर बोला-''होश में आओ ना चचा.. फायदा क्या है?''

''छोड़ दे हरामी की औलाद।'' कहते हुए बागारोफ ने उसे एक तेज धक्का दिया-''छोड़ दे मुझे - मेरा बच्चा खतरे में है। उसकी जगह मैं जान दे दूंगा! उस साले रीछ को तो मैं चीर-फाड़कर सुखा दूंगा। छोड़ो मुझे।''

''नहीं चचा, इससे क्या फायदा होगा?'' हुचांग चीखा-'' आप वहां नहीं पहुंच सकते।''

''चटाक! '' एक झन्नाटेदार चांटा हुचांग के गाल पर पड़ा। यह चांटा जज्वातों के बहाव में पागल हुए बागारोफ ने उसे मारा था। मारते ही चीखा भी-''क्यों नहीं पहुंच सकता चूहे के बच्चे। अपने बच्चे की जान बचाने मैं जहन्नुम में भी पहुंच सकता हूं। तुम.. तुम साले उसके दोस्त नहीं हो। मेरे बच्चे को खतरे में देखकर तुम्हारा खून नहीं खौलता। अगर उसे कुछ हो गया तो एक-एक को जान से मार दूंगा। तुम मेरे बच्चे को मरता देख रहे हो?''

''चचा, जरा सोचो तो सही!'' बांड वहीं पहुंचकर बोला-''आप भला इस दीवार पर कैसे चढ़ जाएंगे? अगर ये मुमकिन होता तो हम तीन दिन से यहां क्यों पड़े रहते? जरा सोचो तो - हम भला माइक के लिए कर भी क्या सकते हैं?''

''कुछ नहीं हरामजादे - कुछ भी नहीं!'' चीख पड़ा बागारोफ-- ''तुम.. तुम कुछ नहीं कर सकते। करोगे भी कैसे, तुम्हारा खून तो सफेद हो चुका है। अपने दोस्त को मौत के मुंह में देख खून न उबले तो वह सफेद खून होता है। तुम चूड़ियां पहनकर बैठो, मैं इस दीवार पर चढ़ूंगा - चाहे जो हो। माइक को मैं मरने नहीं दूंगा।'' इस तरह से - वागारोफ बेहद भावुक हो उठा। सभी जानते थे कि वह अपनी मंडली के सभी जासूसों को बेहद प्यार करता है। अगर कोई भी किसी खतरे में पड़ जाए तो उसके बदले में वह खुद जान देने के लिए तैयार रहता था। हुचांग ने बागारोफ के कहने का बुरा नहीं माना था। बुरा मानने की बात भी नहीं थी। वह अच्छी तरह से जानता था कि माइक को उस भयानक खतरे में देखकर बागारोफ जज्वातों के बहाव में पागल हो गया है। वह जानता था कि अगर वह खुद माइक की जगह होता और माइक उसकी जगह, तो बागारोफ का चांटा माइक के गाल पर पड़ता।

बड़ी मुश्किल से बांड, हुचांग और टुम्बकटू उसे कब्जे में कर पाए।

''बांड!'' ऊपर से पुन: माइक का स्वर उभरा--सबने देखा - इस बार माइक दूसरी कोठरी के दरवाजे पर खड़ा था। उसके; जिस्म पर अब ताजे घाव चमक रहे थे। हालत बता रही थी कि वह जिंदगी से परेशान हो चुका है और मौत को गले से लगाना चाहता है।

''बोलो माइक! '' इस बार बांड जोर से चिल्लाया-- ''क्या तुम बता सकते हो कि हम तुम्हारे पास किस तरह पहुंच सकते हैं?''

''नहीं बांड - यहां मत आना!'' माइक की दर्दीली आवाज पूरे बाग में गूंज उठी-''यहां चारों तरफ मौत-ही-मौत है!''

''अबे तो हरामजादे जल्दी बता - हम तेरी क्या मदद कर सकते हैं?'' बागारोफ चीखा-''ऐसा तू कहां फस गया है? हम तेरे पास किस तरह से आ सकते हैं? बोल वर्ना वहीं से धक्का देकर खुदा के पास पहुंचा दूगा!''

''चचा!'' माइक बोला-''मेरी जान एक ही तरीके से बच सकती है!''

''अबे तो जल्दी बोल।'' बागारोफ चिल्लाया-''बोल वह क्या तरकीब है?''

''अभी आया चचा - जरा इंतजार करो।'' कहने के बाद बिना इधर से किसी का जवाब सुने माइक कोठरी के अंदर समा गया। चारों कोठरी के उस खाली दरवाजे को तकते रह गए - जहां एक सेकंड पहले ही माइक खड़ा था। किसी की समझ में न आया कि वह कहां, किसलिए और क्यों गया है? चारों के दिल बड़ी दुरी तरह से धड़क रहे थे। वे चारों जल्दी-से-जल्दी ये जानना चाह्ते थे कि ऐसी वह एकमात्र कौन-सी सूरत है, जिससे माइक की जान बच सकती? सबकी नजर कोठरी के दरवाजे पर थी।

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