दर्शन तो करें पर इस तरह - श्रीराम शर्मा आचार्य Darshan To Karein Par Is Tarah - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> दर्शन तो करें पर इस तरह

दर्शन तो करें पर इस तरह

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15478
आईएसबीएन :00000

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देव अनुग्रह की उपयुक्त पात्रता प्राप्त किए बिना कोई भी व्यक्ति केवल देवदर्शन अथवा दक्षिणा-प्रदक्षिणा द्वारा मनोरथ को सिद्ध नहीं कर सकता

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देव मंदिरों में दर्शन हमें करने चाहिए और जिन देव-आत्मा की वह प्रतीक प्रतिमा है, उसके सद्गुणों एवं सत्कर्मों को अपने में प्रतिष्ठापित एवं विकसित करने का विचार करना चाहिए। वह विचार इतना भावपूर्ण प्रेरक हो कि देवता की विशेषताएँ जीवन में उतारने की प्रेरणा प्रस्तुत करने लगे तो समझना चाहिए कि देवदर्शन हुआ। हनुमान जी का दर्शन करके ब्रह्मचर्य, सत्यपक्ष की निःस्वार्थ सहायता, दुष्टता के दमन में अपने प्राणों तक की बाजी लगा देना जैसी विशेषताएँ अपने भीतर बढ़ानी चाहिए। भगवान राम के दर्शन करने हों तो पिता-माता के प्रति श्रद्धा, भाईयों के प्रति सौहार्द्र, पत्नी के प्रति अनन्य स्नेह, दुष्टता से जूझने का साहस और भगवान कृष्ण के दर्शन करने पर मित्रता निवाहना, असुरता से लड़ना, रथवान जैसे कामों को भी छोटा न मानना, गीता जैसी मनोभूमि रखना आदि श्रेष्ठ तत्वों को हृदयगंम करना चाहिए। शंकरजी से सहिष्णुता, उदारता, त्याग-भावना, सूर्य से तेजस्वी एवं गतिमान रहना, दुर्गा से प्रतिकूलताओं के साथ साहसपूर्वक जूझना, सरस्वती से ज्ञान का अविरत विस्तार करना जैसे गुणों की प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है। यह प्रेरणा जितनी ही प्रबल होगी देवदर्शन उतना ही सार्थक माना जाएगा। यदि इस प्रकार से कोई गुण चिंतन न किया गया और उन विशेषताओं को अपने जीवन में बढ़ाने के लिए कोई प्रयत्न न किया गया तो फिर किसी प्रतिमा के दर्शन मात्र से स्वर्ग जाने या मनोकामनाएँ पूर्ण होने जैसी मान्यता बना बैठना असंगत ही होगा। देखने का लाभ तो है, पर इतना नहीं जितना लोगों ने मान रखा है। अत्युक्ति सर्वथा अनुपयुक्त ही होती है। फिर चाहे वह अल्पविकसित लोगों को धर्म की ओर कदम बढ़ाने के प्राथमिक प्रयास के रूप में ही क्यों न की गई हो।

मनुष्यों का दर्शन भी ठीक इसी प्रकार है। किन्हीं ज्ञानी, संत, त्यागी, महात्मा या महापुरुष का दर्शन करना, उनके प्रति श्रद्धा, सद्भावना का होना प्रकट करता है, पर इतने से ही कुछ काम चलने वाला नहीं, कदम आगे भी बढ़ाना चाहिए। जिनके दर्शन किए गए हैं उनमें यदि कोई उपयुक्त विशेषताएँ हैं तो उन्हें ग्रहण करना चाहिए उनके उच्चादर्शों या सिद्धांतों में से कोई अपने लिए उपयुक्त हो, उसे ग्रहण करना या व्यवहार में लाना चाहिए। उनसे आत्मीयता बढ़ाकर प्रगति की दिशा में सहयोग लेना चाहिए। ऐसा करने पर ही वह दर्शन लाभदायक होगा अन्यथा आजकल जिस मान्यता से लोग साधु पुरुषों के दर्शन करने जाया करते हैं, उसमें तथ्य अल्प और भ्रांति विशेष है। आज तो लोग देवताओं की तरह मनुष्यों के दर्शनों से भी यह आशा करते हैं कि दूर से चलकर देखने आने को वे अपने प्रति किया गया एहसान मानेंगे और उस एहसान की कृतज्ञता दिखाने के बदले हमारी मनोवांछाएँ पूरी कर देंगे। यह आशा-दुराशा मात्र है क्योंकि कल्याण, कर्मों से ही होता है। सत्कर्मों के लिए प्रेरणा प्राप्त करना ही तो दर्शन का उद्देश्य है, पर प्रेरणा पाने और अपने को बदलने की बात मन में घुसे नहीं, देखने से ही सब कुछ मिल जाने की आशा की जाए तो यह किसी भी प्रकार संभव हो सकने वाली बात नहीं है।

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