भाव बंधनों से मुक्त हों - श्रीराम शर्मा आचार्य Bhav Bandhanon Se Mukt Hon - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
लोगों की राय

आचार्य श्रीराम शर्मा >> भाव बंधनों से मुक्त हों

भाव बंधनों से मुक्त हों

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15475
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 0

5 पाठक हैं

सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्ति की आवश्यकता और उपाय

अहंकार में घाटा ही घाटा

 

स्व के विकृत बोध को ही अहंकार कहते हैं। वह आत्म तत्व से न जुड़कर भौतिक सम्पदाओं के साथ जुड़ा होता है। दूसरों की तुलना में अपने को विशिष्ट मान बैठने पर अहंता की उत्पत्ति होती है। बलिष्ठता सुन्दरता, सम्पन्नता, पद, अधिकार आदि उसके कारण हो सकते हैं। कई बार भ्रम भी उसका निमित्त बना हुआ होता है। जाति-पाँति के आधार पर कई अपने को ऊँचा मानते हैं। इस आधार पर दूसरे नीच या हेय प्रतीत होने लगते है और अहंकार जड़ जमा लेता है।

अपनी अहंता प्रकारान्तर से दूसरों को हेय या हीन गिनने लगती है। अपनी मान्यता को दूसरों को गले उतारने के लिए वह अपने साधनों का उद्धत प्रयोग करती है, ताकि उनकी ओर अन्यान्यों का ध्यान आकर्षित हो, वे उसे देखें, समझें और बड़प्पन स्वीकार करें। इस प्रकार की स्वीकृति तभी बन पड़ती है, जब उसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिले। साधारण स्थिति बनी रहने पर तो ध्यान उस ओर जाता नहीं। इसलिये कुछ न कुछ उद्धत आचरण अहंकारी को करना पड़ता है, अन्यथा दूसरे क्यों उसका बड़पन्न स्वीकार करें? क्यों दबे? क्यों डरें? क्यों गिड़गिड़ाये? क्यों ललचायें? अहकार इस हेतु उद्धत आत्म-प्रदर्शन किये बिना नही रहता। कुछ नहीं तो आत्मश्लाघा सहित अपना बखान स्वयं ही करने लगता है। ऐसी घटनाओं का सच्चा-झूठा वर्णन करता है, जिससे उसकी छाप सुनने पर पड़े और समीपवर्ती उसका लोहा मानने के लिये बाधित हों। इस कार्य के लिये हर घड़ी तो प्रशंसा-कृत्य के लिये साथी-सेवक रखे नहीं जा सकते। इसलिये आतुरता इस रास्ते फूटती है कि अपनी बात या क्रिया में ऐसा पुट लगा रहे, जिसमें उसकी विशिष्टता से दूसरों को अवगत होते रहना पड़े। जब कभी अपने साथ तुलना करे, तो समझें कि इनकी स्थिति मेरी अपेक्षा कहीं अच्छी है। इसलिये इनके सामने मुझे दबकर रहना चाहिये। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो अहंकारी इसमें अपना अपमान मानता है, तिरस्कृत-उपेक्षित अनुभव करता है, इसमें मानहानि की गंध सूँघता है और जिसने महत्ता स्वीकारने में उपेक्षा दिखाई, उसे अपना शत्रु तक मानने लगता है। इसका बदला वह नीचा दिखाने का अवसर ढूँढ़कर करता है। जो हाँ में हाँ न मिलाये, जी हुज़री न करे, उसके साथ वह ऐसा व्यवहार करता है, ऐसीं चाल चलता है, जिससे उसे तिलमिलाने का दण्ड भुगतना पड़े। अहंकारी के पास स्नेह-सौजन्य नहीं रहता। सज्जनता, विनयशीलता, नम्रता का तो अस्तित्व ही नहीं रहा। नशे की खुमारी जिस प्रकार पियक्कड़ को अस्त-व्यस्त अनगढ़ बना देती है, लगभग उससे मिलती-जुलती स्थिति अहंकारी की बन जाती है। यह असामान्य स्थिति, मिथ्या प्रवंचना उसके लिये अन्तत: घातक सिद्ध होती है, जो इस रंग में अपने को रंग लेता है, सनक की तरह इस दुर्गुण को अपना लेता है।

अहंकार हल्की मात्रा में हो या बड़ी मात्रा में, उसका प्रभाव दूसरों पर बुरा ही पड़ता है, उसे उद्धत माना जाता है, सनकी समझा जाता है, प्रकट या अप्रकट में उसके प्रति अन्यों की मान्यता कृत मिश्रित होती है, व्यक्तित्व का वजन उथले-बचकाने स्तर का समझा जाने लगता है। वस्तुस्थिति छिपी तो रहती नही, सभी जानते हैं कि किसी के पास कोई विशेषता है, तो वही उसका लाभ उठाता रहेगा। अन्यों को उसमें भागीदारी नहीं मिलने वाली है। ऐसी दशा में कोई क्यों उसका लोहा माने? क्यों दबाव स्वीकार करे? क्यों मिथ्या आत्मश्लाघा का पोषण करे? अपने को किसी के सामने गया-'गुजरा मानने में उसकी भी तो हेटी होती है। ऐसी दशा में अहंकारी का सारा सम्पर्क क्षेत्र तनाव से भर जाता है।

पियक्कड़ को देखकर लोग आत्म रक्षा के लिये चौकन्ने हो जाते है। उससे बचकर निकलते हैं। उसी प्रकार अभिमानी के प्रति सर्वसाधारण की मान्यता पाखण्डी जैसी बन जाती है। उसके साथ सहयोग करना तो दूर, सम्पर्क करने वालों में से हर एक की इच्छा होतीं है कि इस बला से जितनी दूर रहा जाय, उतना ही अच्छा। न उसका कोई हितैषी रहता है, न मित्र, न घनिष्ठ। मात्र चापलूस ही उसकी हां में हां मिलाकर उत्सु बनाते औस साथ ही अपना कोई अनुचित स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं। उनकी पटरी ऐसे ही लोगों के साथ बैठती है। बार-बार ठगे जाते हैं। फिर भी अन्यत्र कही सहारा न मिलने के कारण ऐसे ही चाटुकारों के पास जा पहुँचते हैं और प्रकारान्तर से उन्हें रिश्वत देते या ठगे जाते रहते हैं।

अहंकार एक भ्रान्ति है, जो आत्म प्रदर्शन के लिये पग-पग पर पाखण्ड रचने के लिये-प्रेरित करती है। जिनमें वस्तुत: कुछ विशेषतायें होती हैं, जो वस्तुत: साधन-सम्पन्न, गुणवान या वरिष्ठ होते हैं, उनमें सज्जनता भी सहज ही साथ रहती है। सज्जनता का पहला लक्षण है-नम्रता, शिष्टता। दूसरा गुण है-हर किसी को यथोचित सम्मान प्रदान करना। जिनमें इनमें से एक भी गुण न हो, उसकी गणना दुर्जनों में होती हैं। मानवी गरिमा की दृष्टि से उसे गया-गुजरा माना जाता है। इस तथ्य से जो अवगत है, उसी को यथार्थवादी या बुद्धिमान कहा जाता है। इसलिये सज्जन अपने में इन तीनों ही विशेषताओं को समुचित मात्रा में अपनाये रहकर अपना दृष्टिकोण और स्वभाव उसी ढांचे में ढाल लेते हैं। उन्हें अभिमान आत्मघात जैसा प्रतीत होता है और उससे बचे रहने का सतर्कतापूर्वक प्रयत्न करते हैं। आत्म-निरीक्षण करते हुए पैनी दृष्टि से यह जाँचते रहते हैं कि कहीं अहंकार ने व्यक्तित्व के किसी पक्ष में डेरा डालना तो आरंभ नहीं कर दिया। यदि किसी भी मात्रा में ऐसा हो रहा होता है, तो वे उसे हटाने के लिये बड़ा प्रयत्न करते हैं। इस दुस्स्वभाव को पतन का गर्त मानकर उसमें गिरने से बचे रहते हैं।

यह दुर्गुण कई बार इतने दबे पाँव आता है कि व्यक्तित्व पर अधिकार जमा लेने पर भी पकड़ में नहीं आता। फिजूलखर्ची के पीछे यही भावनायें काम करती हैं। अमीरी का विज्ञापन करके यह जताया जाता है कि वह सफल और चतुर व्यक्ति है, अन्यथा इतनी सम्पदा इसके पास कहाँ से आती, जो सामान्य खर्च की पूर्ति करने के उपरान्त उफनती और बर्बाद होती फिरे। ठाठ-'बाट ऐसे ही लोग जमा करते है। होटलों और क्लबों में ऐसी ही लोगों की घुसपैंठ होती है। दावत देने, सैर-सपाटे पर निकलने के पीछे उनका मंशा यही होता है कि दूसरे लोग समझें कि यह सामान्य नहीं, असामान्य स्तर के हैं। फोटो छपाने की ललक ऐसे ही लोगों की होती है। अपनी कृतियों का बढ़ा-चढ़ाकर ढिढोरा पीटने-पिटवाने के बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता। अहंकार का जाल-जंजाल ऐसा है, जिसमें फँस जाने वाला अपनी वास्तविक शक्तियों का इस प्रकार उद्धत प्रयोग करता है कि घाटा निरन्तर बढ़ता ही चले। जो कुछ पास में था, उसका सदुपयोग करके कुछ बना और बढ़ा जा सकता था, वह आत्म-प्रदर्शन के कुचक्र में ही बर्बाद हो जाता है। अहंकारी हर दृष्टि से घाटा ही घाटा उठाता है।

जिस प्रकार दर्पण में देख कर चेहरे की गंदगी साफ कर ली जाती है, उसी प्रकार आत्म-निरीक्षण द्वारा अपने चिन्तन और व्यवहार का निरीक्षण-परीक्षण करके यह देखना चाहिये कि स्वभाव में अहमन्यता के दुर्गुण का समावेश तो नहीं होने लगा, नम्रता, शिष्टता और सज्जनता का स्तर घटने तो नहीं लगा, प्रदर्शन की ललक ने अन्तराल में अड्डा जमाना तो आरभ नही कर दिया। यदि ऐसा हो, तो उचित यही है कि समय रहते आत्म-शोधन कर लिया जाय।

...पीछे | आगे....

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book