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ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान प्रयोजन और प्रयास

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15473
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है ब्रह्मवर्चस् का प्रयोजन और प्रयास

वनौषधियों का वाष्पीकृत स्थिति में प्रयोग


वनौषधियों का मोटा प्रयोग यही चलता आया है कि उन्हें ताजी स्थिति में हरा रहते हुए तोड़कर सिल पर पीस और पानी में घोलकर पिया जाय अथवा चटनी की तरह बनाकर चाट लिया जाय। यह कल्क-प्रक्रिया का प्रचलित रूप है। छाया में सुखा लेने के बाद उन्हें कूट-छानकर चूर्ण बना लेने तथा पानी, मधु या किसी प्रवाही द्रव के साथ गले उतारने में सुविधा रहती है। सेवन की मात्रा बढ़ती-घटती न रहे, इसके लिए उन्हें गोली के रूप में, वटिका आदि के रूप में भी विनिर्मित कर लिया जाता है। गोली में समाविष्ट द्रव्य में कुछ ऐसे स्वरस मिलाये जाते हैं, जिनसे उनका आकार स्थिर रहे और गुणवत्ता अपेक्षाकृत अधिकाधिक स्थिर स्थिति में बनी रहे। यह सभी रूप ऐसे हैं जिनमें वनौषधियों को ठोस रूप में सेवन किया जाता है।

पदार्थ के तीन रूप सभी को विदित हैं-ठोस, द्रव और वाष्प  (गैस)। जड़ी-बूटियों का तीनों ही रूपों में सेवन किया जा सकता है। उनकी गुणवत्ता भी आकार के सूक्ष्म होने के अनुपात में उसी क्रम से अधिक प्रभावोत्पादक होती चली जाती है। ठोस रूप की चर्चा ऊग्र हो चुकी। द्रव रूप मे आसव, अरिष्ट, क्वाथ, अर्क, सिरप, ड्राप्स आदि का रूप दिया जाता है। ठोस आकार को आमाशय जब पचाता है, तो वह रस रूप में परिवर्तित होकर शरीर का अंग बनता है। द्रव रूप में उसका पाचन सरल पड़ता है। ठोस आहार की तुलना में रस, छाछ, दूध, पानी आदि प्रवाही वस्तुएँ अपेक्षाकृत जल्दी पचती है। इसीलिए आयुर्वेद चिकित्सक यथास्थिति यथा आवश्यकता. औषधियो को द्रव रूप में देने की उपयोगिता अधिक अनुभव करते हैं।

ठोस पद्धति में औषधि को अधिक प्रभावी बनाने का एक विशेष तरीका यह है कि उनकी घुँटाई-पिसाई अधिक देर तक की जाय। इससे उनके कण अधिक बारीक हो जाते हैं। उसमें दबी हुई अणु शक्ति उभर आती है और प्रसुप्त शक्ति के जागृत होने पर अधिक प्रतिफल उपस्थित करती है। आयुर्वेद शास्त्रों में जहाँ-तहाँ अधिक पीसने-घोंटने, अधिक समय तक अनेक रस-पुट देकर घोंटने के भी विधान हैं, ताकि औषधियों की प्रसुप्त शक्तियों को जगाने का विशेष लाभ उपलब्ध हो सके।

होम्योपैथी, बायोकेमिक, डीशेन की निर्माण पद्धति में भी इस सूक्ष्मीकरण का महत्त्व अधिक जोर देकर प्रतिपादित किया गया है। इस प्रयोग को सही व अधिक प्रभावशाली पाया गया है। इसके लिए शान्तिकुञ्ज की प्रयोगशाला में उन यंत्र उपकरणों को लगाया गया है, जो लम्बे समय तक कुटाई-पिसाई, घिसाई आदि का उपक्रम जारी रख सकें। पुराने खरल आदि का समय अब नहीं रहा। बॉल हैमर मिल एवम् पल्वेराइजर के रूप में पिसाई, घुटाई करने वाले उपकरण अब बनने लगे हैं। ऐसे ही शक्तिशाली संयंत्र शान्तिकुञ्ज की प्रयोगशाला में लगे हैं, जिसमें जाँची-परखी, धोकर छाया में सुखायी हुई कचरारहित औषधियों की पिसाई की जाती तथा आवश्यकता पड़ने पर उनकी सामर्थ्य बढ़ाने के लिए उनकी ताजी स्थिति में निकाला हुआ स्वरस मिलाकर, फिर घुटाई की जाती है। इस प्रकार शक्ति सामर्थ्य उसी आधार पर कई गुणा हो जाती है, जिस आधार पर शतपुटी, सहस्त्रपुटी भस्में बनायी जाती हैं। सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया का यह अभिनव प्रयोग है।

सही निष्कर्ष प्राप्त करना हो तो अनिवार्य है कि वनौषधियों को अपने ही उद्यान में उगाया जाय। जो जिस क्षेत्र की हो उसे पैदा कर वहीं से उसे उपलब्ध किया जाय। परिपक्व स्थिति में ही उन्हें उखाड़ा जाय। अन्वेषणों, उपकरणों द्वारा यह पता लगाया जाता रहे कि पौधा असली है या नकली? यह सब ऐसी विशेषताएँ हैं, जिनके चलते शान्तिकुञ्ज के उत्पादन अधिक सही होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक गुणकारी सिद्ध होते हैं। कौन सी औषधि किस प्रजाति की है व कौन सी प्रजाति किस रोग में ली जानी चाहिए उसके किस अंग में कार्यकारी घटक अधिक मात्रा में व प्रभावी स्थिति में होंगे, इसका अध्ययन विभिन्न प्रयोगशालाओं में होता रहा है। उन अध्ययनों को सामने रख कर यहाँ के वैज्ञानिक फार्मेकोग्रोसी (शुद्धाशुद्ध परीक्षा) पद्धति का आश्रय लेकर, स्टीरियो माइक्रोस्कोप्स माइक्रोटोंम तथा रासायनिक प्रक्रिया द्वारा यह जाँचते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में विभिन्न रोगों में किस औषधि को दिया जाना उचित होगा तथा सही-शुद्ध औषधि कौनसी है, जिसके अमुक अंग को सूक्ष्मीकृत स्थिति में प्रयुक्त किया जाना चाहिए?

शान्तिकुञ्ज के वैज्ञानिक अनुसंधान में जड़ी-बूटी उपचार को प्रयोग स्तर पर हाथ में लिया गया है, व्यापारिक उत्पादन स्तर पर नहीं। यों इस सुविद्याधाका स्थायी कार्यकर्त्ता, आगन्तुक शिविरार्थी, दर्शनार्थी सतत् लाभ उठाते रहते हैं। आयुर्वेद एवं एलोपैथी के स्नातकोत्तर स्तर तक प्रशिक्षित अनुभवी चिकित्सकों को यहाँ कंधे से कंधा मिलाकर प्रयोग-परीक्षण में निरत देखा जा सकता है।

वनौषधि उपयोग की प्रक्रिया का तीसरा पक्ष और भी है, जो पुरातन काल में अत्यधिक प्रचलित था पर मध्य युग में उस मूल विद्या को भुला ही दिया गया। साथ ही पेचीदे जाल-जंजालों का समावेश हो जाने में यह जटिल, खर्चीला और कठिन भी हो गया। आडम्बरों के आवरण में उसकी वास्तविकता भी छिप गयी। अब उस प्रयोग को नये सिरे से जन समुदाय के समक्ष लाया गया है और नये सिरे से उसे विज्ञानसम्मत परीक्षण प्रक्रिया से गुजारा जा रहा है। यह आधार है-अग्रिहोत्र, जिसमें वाष्पीभूत वनौषधियों द्वारा मानव समूह की अथवा आस-पास के वातावरण की चिकित्सा की जाती है।

यज्ञ और अग्रिहोत्र में अन्तर है। इसे भली-भांति समझा जाना चाहिए। यज्ञ एक धर्मानुष्ठान है, उसमें भावनाओं की शक्ति का-मंत्र शक्ति का उच्चस्तरीय समावेश आवश्यक है। यज्ञ हेतु याजकों का कड़ाई से चुनाव किया जाता है। प्रयोग में आने वाली सभी वस्तुएँ अभिमत्रित करनी पड़ती हैं। निर्धारित विधि-विधानों का शास्त्रोक्त विधि से प्रयोग करना पड़ता है। शुद्धता के हर पथ पर अध्यात्म दृष्टिकोण से विचार करना पडता है। प्रयोक्ता और ग्रहीता-पुरोहित और यजमान दोनों को ही व्रतशील बनना पडता है। संकल्प शक्ति का समावेश उसके हर पक्ष में होता है। प्रयोक्ता पक्ष के ब्रह्मा-आचार्य-अध्वर्यु-उद्गाता अपने-अपने स्तर के उत्तरदायित्व निभाते हैं। प्रत्येक में कुछ न्यूनतम योग्यताएँ अनिवार्य होती हैं। यजमान पत्नी समेत बैठता है। उन दोनों को भी अधिक व्रत-सकल्पों के साथ अपनी सौम्य सात्विकता को उभारना पड़ता है। संलग्र पुरोहित वर्ग का स्तर तो और भी उच्चकोटि का होना चाहिए। मंत्रोच्चार शुद्ध एवं स्वर संयत होना चाहिए। समिधाओं, शाकल्प मत आदि में भी निर्धारित पवित्रता और विशिष्टता का समावेश आवश्यक होता है। यह समुची प्रक्रिया पुरातन काल के याज्ञिकों को विदित थी और वे जानने थे कि किस प्रयोजन के लिए विधान उपहार के लिए किन वस्तुओं, द्रव्यों, पदार्थों और मत्र-सूक्तों का किस प्रकार प्रयोग होना चाहिए। आज नो इस संदर्भ में परिपूर्ण जानकारी किन्हीं विरलों को ही रह गयी हे। वह पीढ़ी भी क्रमशः समाप्त होती जा रही है। अधूरी जानकारी के कारण उसका वैसा प्रतिफल भी नहीं होता, जैसा कि होना चाहिए था।

शान्तिकुञ्ज की ब्रह्मवर्चस शोध प्रक्रिया में अग्रिहोत्र विधा को ही हाथ में लिया गया है इस प्रकरण को पूरा कर लेने के उपरान्त ही सम्भवत: यज्ञ विज्ञान पर हाथ डाला और उसे समग्र  रूप में सम्पन्न कर विज्ञानसम्मत प्रमाणित कर पाना सम्भव हो सकेगा। अभी तो उपलब्ध  वैज्ञानिक आधारों का प्रत्यक्षवादी पक्ष हाथ में लेते हुए अग्निहोत्र का वह प्रकरण प्रयोग का  विषय बनाया गया है, जिसमें वनौषधियों के समुचित सम्मिश्रण से विनिर्मित हवन सामग्री  एवं वन्य काष्ठ की समिधाओं के वाष्पीभूत प्रयोग को सम्पन्न किया जाता है। इसमें अग्नि  स्तर की ऊर्जा का प्रयोग होने से, उसके लिए अग्निहोत्र का पुरातन नाम, नये रूप में ठीक ही प्रयुक्त किया गया है।

सर्वविदित है कि पदार्थ अविनाशी है। उसका स्वरूप परिस्थितिवश ठोस, द्रव एवं गैस रूप में परिवर्तित होता रहता है। वनस्पतियाँ भी पदार्थ हैं। उनका उपयोग स्वास्थ्य-संवर्धन और रोग- निवारण के उभय प्रयोजनों के लिये किस प्रकार किया जाय, यही आयुर्वेद की चिरपुरातन और  बहुप्रचलित विधा है। वैदिक काल में ऋषिगण इसी माध्यम से व्यक्तियों के समूह की, जीव जगत की, पर्यावरण की चिकित्सा करते थे। सामान्य रूप से आयुर्वेद में ठोस एवं द्रव पक्षों का ही आमतौर से प्रयोग होता रहता है। चूर्ण, आसव, काथ, अरिष्ट, अवलेह, मोदक आदि के रूप में ही प्राय: उसका प्रयोग होते देखा जाता है। तीसरा एवं अति महत्त्वपूर्ण वाष्पीकरण का पक्ष, अधिक सूक्ष्म होने के कारण अधिक प्रभावोत्पादक है। एयरोसॉल अथवा आयन रूप में-सूक्ष्मीकृत स्थिति में होने के कारण वह तुरन्त प्रभाव दिखाता है। इतने पर भी उस विधा को उपेक्षा के खड्ड में धकेल दिया गया है। उसका विकृत स्वरूप अन्न व घृत होम होने के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि वह आज की दुष्काल भरी परिस्थितियों में न तो सम्भव है, न शास्त्रसम्मत और न व्यावहारिक। प्रतिगामियों को, नास्तिकों को यहीं पर प्रहार करने का अवसर मिल जाता है; क्योंकि वे स्वयं तो यज्ञ व अग्निहोत्र का अन्तर समझ नहीं पाते। अग्निहोत्र करने वाले इस प्रक्रिया को सही रूप में सम्पन्न न कर, दोनों का गुड़गोबर कर खिल्ली उड़ाते हैं, जबकि आयुर्वेद के लगभग सभी ग्रंथों में औषधियों का धूम्र रूप में स्थानीय एवं अन्तरंग प्रयोग होने का उल्लेख है;  परन्तु इन दिनों इस प्रकार के प्रयोग होते कदाचित ही कहीं देखे जाते हैं।

शान्तिकुञ्ज के अनुसंधान में इस विधा को अपने हाथ में लिया गया है और इस प्रक्रिया को पूर्णत: विज्ञानसम्मत प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है। इस आधार पर वनौषधियों द्वारा मानव समुदाय की जीवनीशक्ति, प्रतिरोधी सामर्थ्य बढ़ाकर, शारीरिक रोगों के निवारण के रूप में इसका उपयुक्त प्रभाव देखा जाता है। इसके अतिरिक्त मानसिक सामर्थ्य बढ़ाने, मनोविकारों के निवारण रूपी लाभों की एक दूसरी श्रृंखला भी साथ ही जुड़ती है, जिसके सम्बन्ध में अन्य पद्धतियों में प्राय: कम प्रयोग हुए हैं। उदाहरण रूप में ईथर, नाइट्रस ऑक्साइड, क्लोरोफार्म आदि को सुँघाकर ऑपरेशनों के समय बेहोश करने की विधा काम में लायी जाती है। जुकाम की स्थिति में विक्स तथा बेंजोइक अम्ल के वाष्पीभूत ध्रूम नासिका मार्ग से ग्रहण किये जाते हैं एवं दमे का तेज दौरा पड़ने पर आइसोप्रिनेलिन कार्टीसोन, टरब्यूटेमॉल इत्यादि वाष्प रूप में दिये जाते हैं। यही नहीं, दिल का दौरा पड़ने पर कैप्सूल रूमाल में फोड़कर वाष्पीभूत औषधि अमाइल नाइट्राइट को तुरन्त सूँघने के लिये कहा जाता है। यह रोगों के विभिन्न सूक्ष्म अंगों  तक औषधि पहुँचाने का सबसे सुगम, व्यापक एवं सशक्त मार्ग है। इसी प्रकार जोड़ों के दर्द में औषधियों की भाप पीड़ित स्थान पर केन्द्रीभूत कर उससे दर्द-निवारण का परामर्श भी दिया जाता है। फिर भी ये कुछ आधे-अधूरे प्रयोग ही हैं। वनौषधियाँ वाष्पीभूत होकर किस प्रकार सरलतापूर्वक अंग-प्रत्यंगों तक पहुँचती हैं और किस प्रकार अपने अभिनव द्रुतगामी प्रभाव दिखाती हैं, इसका एक अलग ही अनोखा विधान है।

अग्निहोत्र में तैलीय तत्त्व प्रधान समिधाएँ और हवन सामग्री दोनों का ही प्रयोग होता है। बहुत न्यून मात्रा में शकर एवं घी (शुद्ध न उपलब्ध होने की स्थिति में गाय का दूध) को भी सम्मिलित किया जाता है। समिधा के रूप में मान्य काष्ठ (जो विशिष्ट गुण सम्पन्न औषधीय तत्त्वयुक्त होते हैं) ही प्रयुक्त होते हैं। ऐसे काष्ठों में शारीरिक रोगों के निवारण की शक्ति पायी जाती है। आमतौर से आम, पीपल, वट, शमी, चन्दन, देवदारु, तगर, बिल्व जैसे वृक्षों की लकड़ियाँ ही इस निमित्त अग्नि प्रज्ज्वलन के लिए काम में लायी जाती हैं। किस प्रजाति में क्या-क्या संघटक तत्व हैं, वह कैसे जाना जाय एवं किस आधार पर किसे प्रामाणिक माना जाय, यह चुनाव शान्तिकुञ्ज के वैज्ञानिक कालम क्रोमेटोग्राफी, थिनलेयर क्रोमेटोग्राफी तथा गैस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी यंत्रों के माध्यम से करते हैं। गैस लिक्वड  क्रोमेटोग्राफी पूरी तरह से कम्युटराइज्ड एक जटिल संयंत्र है जो औषधियों के सान्द्र क्वाथ  एवम् वाष्पीभूत गैसों का परिपूर्ण विश्लेषण कर, उनको एक ग्राफ पर अंकित करता जाता है।  इससे यह जानकारी मिल जाती है कि ज्वलन के पूर्व औषधियुक्त पौधे में क्या-क्या कार्यकारी तत्त्व विद्यमान थे एवं उस प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त उनमें क्या परिवर्तन हुआ? धूम्र में  कहीं कार्बन के हानिकारक कण तो विद्यमान नहीं हैं, यह प्रामाणिक जानकारी भी जी.एल.सी  यन्त्र दे देता है। जिस कुण्ड में हवन किया जाता है उसका ज्यामितीय आकार बहुत महत्त्व  रखता है। यह उलटे पिरामिड के आकार का होता है। नीचे सँकरा, ऊपर चौड़ा। जितना आयतन होता है, उतनी ही समिधायें डाली जाती हैं व उतनी ही हवन सामग्री, ताकि संतुलित ऊर्जा पैदा होती रहे, अग्नि प्रदीप्त रहे धुआँ उत्पन्न न हो। निर्धारित एक आहुति में जितना हविष्य (जौकुट स्थिति में) जाता है, वह लगभग तीन माशे के बराबर होता है। ताम्रपात्र या हवन  कुण्ड इतनी दूर रहता है कि याजक तो अधिक गर्मी अनुभव न करें एवं जो भी धूम्र बने, वे श्वास मार्ग से अन्दर जाते रहे। आधे घण्टे का औसत प्रयोग पर्याप्त माना जाता है। कितनी  उष्मा यज्ञ प्रक्रिया के विभिन्न खण्डों में उत्पन्न हुई, इसका मापन थर्मोकपल यन्त्र करता है। प्रकाश की तीव्रता ''लक्समीटर'' मापता है तथा अग्नि लौ के स्पेक्ट्रम को स्पेक्ट्रोस्कोप द्वारा  देखा जाता है।

वनौषधि यजन प्रक्रिया, धूम्रों को व्यापक बनाकर सुगन्ध फैलाकर समूह चिकित्सा की विधा है, जो पूर्णत: विज्ञानसम्मत है। गंध-प्रभाव के माध्यम से मस्तिष्क के प्रसुप्त केन्द्रों का उद्दीपन, अंदर के हारमोन रस-द्रव्यों का रक्त में आ मिलना तथा श्वाँस द्वारा प्रमुख कार्यकारी औषधि घटकों का उन ऊतकों तक पहुँच पाना, जो कि जीवनीशक्ति निर्धारण अथावा व्याधि निवारण हेतु उत्तरदायी हैं, ये कुछ ऐसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं, जो वनौषधि यजन अर्थात् अग्निहोत्र  से प्राप्त होती हैं। अग्निहोत्र प्रक्रिया विज्ञान की कसौटी पर कितनी सही है, ब्रह्मवर्चस के वैज्ञानिक भौतिकीय एवं रासायनिक आधार पर यह परीक्षण कर रहे हैं। अपने उद्देश्य में उन्हें महत्त्वपूर्ण सफलताएँ मिल भी रही हैं।

अग्निहोत्र से शरीर ही नहीं, मन का भी उपचार

वनौषधियों के पंचांग को कूटकर खाने में उसे बड़ी मात्रा में निगलना कठिन पड़ता है। यही स्थिति ताजी स्थिति में कल्क बनाकर पीने में उत्पन्न होती है। इससे तो गोली या वटिका  बना कर सेवन करने में मनुष्य को कम कठिनाई अनुभव होती है। सूखी स्थिति से भी क्वाथ, अर्क, आसव, अरिष्ट अधिक सुविधाजनक रहते हैं और प्रभावी भी होते हैं। ठोस और द्रव की  उपरोक्त दोनों विधाओं से बढ़कर वाष्पीभूत औषधि की प्रभाव क्षमता अधिक व्यापक एवं गहरी होती है। नशा करने वाले मुँह से भी गोली या मादक द्रव्य लेते हैं, अपनी नसों में भी इन्जेक्शन लगाते हैं, पर इससे भी अधिक तीव्र व शीघ्र नशा उन्हें नाक से सूँघी हुई औषधि या धूम्रपान द्वारा आता है। यह इसलिए कि वाष्पीभूत मादक द्रव्य नासिका एव फेफड़ों के माध्यम से अन्दर पहुँचकर प्रभावी हो जाते इस प्रकार स्पष्ट है कि ठोस, द्रव और गैस के तीन रूपों में पाया जाने वाला पदार्थ एक के बाद दूसरे की अपेक्षा तीसरे स्तर पर अधिक क्षमतावान होता चला जाता है।

अग्रिहोत्र विद्या के साथ भी ऐसे ही अनेक कारण जुड़े हुए हैं, जिनके कारण उसे प्राचीनकाल में उच्चकोटि की प्रतिष्ठा मिली थी। आज भी उस मान्यता को पुन: प्राण मिलने की स्थिति है। वनौषधियाँ वाष्पीकृत स्थिति में फेफड़े में होती हुए मस्तिष्क आदि अवयवों में होकर शरीर के जीवकोषों तक पहुँचती व अपनी इस सीधी पहुँच के कारण ही प्रभाव दिखा पाने में सक्षम हो पाती हैं। फेफड़ों में विद्यमान वायुकोष्ठकों का औसत क्षेत्रफल लगभग १०० वर्ग मीटर होता है। प्रकोष्ठों की झिल्ली दस माइक्रोमीटर पतली होती है। एक बार में साधारण श्वांस द्वारा वायु का ५०० मिलीलीटर एवं गहरी श्वांस द्वारा ९०० से ९५० मिलीलीटर आयतन अन्दर प्रवेशकर इसके बदले कार्बन डायआक्साइड को बाहर भेज देता है। ऐसी श्वांस-प्रश्वांस प्रक्रिया एक मिनट में १५ से १८ बार होती हें। इस प्रकार एक मिनट में जब तक हृदय लगभग ७० से ८० बार धड़क चुका होता है, श्वांस मार्ग ७५५० मिलीलीटर वायु का आदान-प्रदान हो चुका होता है। इन आँकड़ों से एक अनुमान इस सशक्त माध्यम का लगाया जा सकता है, जिससे वनौषधि यजन प्रक्रिया द्वारा वाष्पीभूत धूम्र शरीर में प्रविष्ट कराए जाते हैं। यजन-प्रक्रिया के अनेकानेक आध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त, उसका प्रभाव शरीर और मन के सभी महत्त्वपूर्ण अवयवों तक पहुँचने की मान्यता का वस्तुतः तर्कपूर्ण आधार है।

मस्तिष्कीय उपचार अपने आप में एक ऐसी विधा है जिसकी आवश्यकता शरीरोपचार से भी अधिक समझी जानी चाहिए। इन दिनों मनोविकारों-मानसिक रोगों की भरमार शारीरिक बीमारियों से कहीं अधिक है; किन्तु इसे विडम्बना ही कहना चाहिए कि समस्त चिकित्सा पद्धतियाँ मात्र शारीरिक व्यथाओं के इर्दगिर्द ही अपने प्रयासों को सीमित रख रही हैं। संसार में अनेकानेक चिकित्सा पद्धतियों का प्रचलन है; किन्तु उनमें से एक भी नहीं है, जो मनोविकारों पर ध्यान देती और उनके समाधान खोजती हो। गेस्टाल्ट साइकोथेरेपी से लेकर साइकोथेरेपी अनेकानेक पद्धतियाँ प्रचलन में हैं पर मनुष्य की स्थूल परत तक ही अपनी पैठ बिठा पाती हैं। भारतीय मनोविज्ञान में जिसे अन्तःकरण चतुष्ट्य कह कर संबोधित किया गया है, उसके उपचार का विधान मात्र अग्रिहोत्र उपचार पद्धति में देखने को मिलता है। आत्महत्या की प्रवृति से लेकर विभिन्न भ्रान्तियों-सनक वाले रोगी जेल स्तर पर पागलखानों में कैद कर दिये जाते हैं। बहुसंख्यों को बिजली के झटके भी लगा दिये जाते हैं; किन्तु इस उपचार से कितने रोगी अच्छे हो पाते हैं, यह नहीं कहा जा सकता। शामक एवं मस्तिष्क को संज्ञाशून्य करने वाली औषधियाँ ही प्रचलन में दिखाई पड़ती हैं। हो सकता है, इससे उन्माद में कुछ घट-बढ़ होती हो पर जनसमुदाय में से अधिकांश को जिन हल्के मनोरोगों का शिकार बनकर रहना पड़ रहा है, उनके निराकरण का कोई विकल्प नजर नहीं आता।

इन दिनों अन्यान्य प्रदूषणों के साथ एक प्रदूषण और आ जुडा है-वह है चिन्तन का, आस्थाओं का प्रदूषण। आशंका, अविश्वास. अकारण चिन्ता, भय, उत्तेजना, असंतुलन आदि से कितने ही लोग घिरे देखे जाते हैं। सोचने की सही पद्धति हाथ न लगने के कारण कितने ही लोग बौखलाए फिग्ते रहते हैं। कइयों को निराशा, उदासी घेरे रहती है। मनोबल, संकल्पशक्ति का नितान्त अभाव दिखाई पड़ता है। कई कल्पनाएँ गढ़ते और उनमें उलझकर इस प्रकार रहते हैं, मानों उनपर कोई विपत्ति का पहाड़ टूटने वाला हो। कुकल्पनाएँ चित्र-विचित्र मोड़ लेकर बहकाती रहती हैं। इन विकारो से व्यक्तित्व टूट जाते हैं। कइयों के परस्पर विरोधी कई व्यक्तित्व उभर आते है। सोचते कुछ, कहते कुछ और करते कुछ हैं। अवास्तविक को वास्तविक मानते हैं। इनकी विक्षिप्तता स्वयं अपने को बेतुके असमंजमों में डाले और हैरानियों मे उलझाये रहती है। ऐसी सनकें न्यूनाधिक मात्रा मे असंख्यों पर छायी रहती हैं। प्रत्यक्षत: दिखाई भले न पड़ती हों थोड़े में सम्पर्क से ही ये उभरकर सामने आ जाती हैं। जिन्हें विवेकशील और संतुलित व्यक्तित्व वाला कहा जा सके, ऐसे कोई विरले ही व्यक्तित्व दिखाई देते हैं।

ब्रह्मवर्चस के वैज्ञानिक गहन मनोवेज्ञानिक जाँच पड़ताल के बाद व्यक्तित्व संबंधी इन विकृतियों का निदान करते हैं। आत्मप्रत्यय व्यक्तित्व विश्रेषण एवं विभिन्न मनो-आध्यात्मिक प्रश्र्नावलियों के माध्यम से उन प्रसुप्त मनोविकारों की जाँच पड़ताल की जाती है, जो बहिरंग में नजर आ रहे लक्षणों-शारीरिक रोगों के मूल में निहित होते हैं। प्रायश्चित परंपरा के माध्यम से साधकों, परीक्षार्थियों से उनके विगत के चिन्तन, क्रिया-कलाप, वर्तमान मनःस्थिति तथा भविष्य के प्रति दृष्टिकोण को जानने का प्रयास किया जाता है। चिकित्सा तंत्र के प्रति आस्था एवं वातावरण में विद्यमान विशिष्टता उनकी गहरी से गहरी ग्रंथि खोलने में सहायक होती है। 'पॉलिग्राफ' नामक यंत्र इस प्रक्रिया में सहायता करता है। इसमें त्वचा का विद्युतीय प्रतिरोध, माँसपेशियों की विद्युत तथा मस्तिष्क की आल्फा वेव्ज को भी मापे जाने एवं ''बायोफीडबैक'' यंत्र द्वारा परीक्षार्थियों को क्रमश: ग्रन्धिमुक्त होने का शिक्षण दिये जाने की भी व्यवस्था है। साधारण स्थिति में भी यही उपकरण व्यक्ति की ध्यान, एकाग्रता में वृद्धि तथा मनःशक्ति संवर्धन द्वारा विद्युतीय त्वचा प्रतिरोध में अन्तर के रूप में परीक्षण के काम आते हैं।

इन दिनों उद्धत स्वभाव की तरह अपराधी कृत्यों की, आत्महत्याओं, बलात्कारों की भी बाढ़ आ रही है। अभक्ष्य भक्षण, नशेबाजी का दौर बेहिसाब चल रहा है। इन सबका भी जनमानस पर कम कुप्रभाव नहीं पड़ रहा है। चिन्तन और चरित्र की गिरावट का भी मनोविकारों की अभिवृद्धि मंी योग होना ही चाहिए। यही कारण है कि शारीरिक और मानसिक रोगों की व्यापकता और गहराई दोनों बढ़ती जा रही है। रोगों में रक्तचाप वृद्धि, पाचन-तंत्र की विकृतियाँ, रक्तविकार, दमा, जननेन्द्रियों की बीमारियाँ तथा मानसिक तनाव आदि का बाहुल्य है। नयी दवाऐं नित्य निकलती है, किन्तु कुछ ही दिनों में गुणहीन होने लगती हैं।

ऐसी दशा में वनौषधि की सूक्ष्म शक्ति का उपयोग आवश्यक हो गया है। वायुभूत बना लेने पर साँस के द्वारा मस्तिष्क के अनेक क्षमता क्षेत्रों और शरीर के अन्तरंग अवयवों तक आसानी से पहुँचायी जा सकती हैं। उनकी प्रभाव क्षमता अधिक एवं स्थायी है। इन औषधियों के कार्यकारी घटकों, शरीर के अन्तरंग अवयवों तक पहुँचाने की सामर्थ्य एवं उनके प्रभाव का परीक्षण भी किया जा सकता है।

अंग अवयवों में, जिन रसायनों की-जिन ऊर्जा तत्वों की कमी पड़ती है, वह उपयुक्त सामग्री सामने प्रस्तुत होने पर, अग्रिहोत्र वाष्प में से खींच ली जाती है और आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है। जो कुछ भी कमी रहती है, वह यज्ञावशिष्ट भष्म एवं चरु सेवन के माध्यम से पूरी हो जाती है। यही अग्रिहोत्र प्रक्रिया अपनी ऊष्मा से, वायुभूत तैलीय औषधि तत्वों का फेफड़ों द्वारा अवशोषण बढ़ा देती है। साथ-साथ अल्प मात्रा में त्वचा से होने वाली श्वसन प्रक्रिया की गति बढ़ा देती है। इसे वायटेलोग्राफ (स्पायरोमेट्री) द्वारा लंगफंक्शन तथा ''प्लेथिज्मोग्राफी'' द्वारा रक्त का आयतन ज्ञात कर मापा जाता है। यह कार्य ब्रह्मवर्चस की प्रयोगशाला में चल रहा है।

अग्रिहोत्र उपचार की यही विशेषता है कि शारीरिक एवम् मानसिक रोगों में जिन तत्त्वों की कमी पड़ जाती है, उन्हें धूम्र में से आसानी से खींच लिया जाता है। साथ ही प्रश्वॉस द्वारा भीतर घुसी अवांछनीयता को बाहर धकेल कर सफाई का आवश्यक प्रयोजन पूरा कर लिया जाता है। बहुमुखी संतुलन बिठाने का यह माध्यम हर प्रकार की विकृतियों का निराकरण करने में असंदिग्ध रूप मे सफल होता है।

अग्रिहोत्र उपचार की एक प्रकार की समूह चिकित्सा है, जिससे एक ही प्रकृति की विकृति वाले विभिन्न रोगी लाभाविन्त हो सकते हैं। यह सुनिश्चित रूप से त्वरित लाभ पहुँचाने वाली सबसे सुगम एवं सस्ती उपचार पद्धति है। जब वाष्पीभूत होने वाले औषध तत्त्वों को साँस के साथ घोल दिया जाता है, तो वह रक्तवाही संस्थान के रास्ते ही नहीं, कण-कण तक पहुँचने वाले वायु संचार के रूप में भी वहाँ जा पहुँचता है, जहाँ उसकी आवश्यकता है।    

यह बहुविदित तथ्य है कि हाइपॉक्सिया (कॉमा) के रोगी को अथवा वेण्टीलेशन में व्यतिक्रम आने पर, साँस लेने में कठिनाई उत्पन्न होने पर नलिका द्वारा नाक से ऑक्सीजन पहुँचायी जाती है; किन्तु इसमें ऑक्सीजन को शुद्ध रूप में नहीं दिया जाता। इसमें कार्बन डायऑक्साइड की लगभग पाँच प्रतिशत मात्रा का भी एक संतुलित अंश रहता है, ताकि मस्तिष्क के केन्द्रों को उत्तेजित कर श्वसन प्रक्रिया नियमित बनायी जा सके। अग्रिहोत्र में उत्पन्न वायु ऊर्जा में भी यही अनुपात गैसों के सम्मिश्रण का रहता है। विशिष्ट समिधाओं के प्रयुक्त होने से उत्पयुक्त ऊर्जा इस सम्मिश्रण को उपयुक्त स्तर का बना देती है। किन समिधाओं व किन वनौषधियों की कितनी मात्रा ऊर्जा उत्पन्न करने हेतु प्रयुक्त की जाय, यह इस विधा के विशेषज्ञ जानते हैं एवं तदनुरूप परिवर्तन करते रहते हैं।

शारीरिक रोगों एवं मनोविकारों से उत्पन्न विपन्नता से छुटकारा पाने के लिए अग्रिहोत्र से बढ़कर अन्य कोई उपयुक्त उपचार पद्धति है ही नहीं, यह अब सुनिश्चित होता जा रहा है।

यह युगसंधि की बेला है। बीसवी सदी में यज्ञाग्रि ही अवांछनीयताओं का समापन एवं इक्कीसवीं सदी के साथ उज्जवल भविष्य के आगमन एवं सतयुग की वापसी का वातावरण विनिर्मित करने जा रहा है। दोनों शताब्दियों की मध्यवर्ती अवधि वाली युगसंधि इन्हीं दिनों चल रही है।      

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