पलायन - वैभव कुमार सक्सेना Palayan - Hindi book by - Vaibhav Kumar Saxena
लोगों की राय

नई पुस्तकें >> पलायन

पलायन

वैभव कुमार सक्सेना

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15417
आईएसबीएन :978-1-61301-680-0

Like this Hindi book 0

5 पाठक हैं

गुजरात में कार्यरत एक बिहारी मजदूर की कहानी

8

तभी एक बालक स्कूल की ओर जाता हुआ दिखाई दिया माँ ने उसे बुलाकर पूछा –"कहां जा रहा है?”

बच्चे ने कहा-"स्कूल जा रहा हूँ। मास्टर जी गए क्या?”

माँ ने कहा, "हाँ! गए, वह कब स्कूल जाने में देरी करते हैं।

सुनो मास्टर जी से कहना तीन किलो तिल्ली लेकर आएँ।"

माँ को विश्वास नहीं हुआ कि बच्चा बोल पाएगा। माँ ने दोबारा पूछा –"क्या बोलेगा?”

बच्चे ने होशियारी से जवाब दिया – "घर पर तीन किलो तिल्ली मंगाई है।"

माँ तिल्ली का इंतजार करती रही, तब तक बेसनिया मठरी और अन्य सामग्री बना दी। अमरकांत जब वापस घर पहुँचा तो माँ के इतना सारा काम करने पर नाराजगी जताई और कहा, "वहां सब कुछ मिल जाता है एक बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें सब सामान रेडीमेड मिलते हैं मैं पिछली बार गया था और पालक मटरी लाया था बहुत स्वादिष्ट थी।"

माँ ने कहा, "नही नहीं ! मैने तो बना दिया। सुबह ऑफिस जाते समय नाश्ता कर लिया करना।" अमरकांत माँ के प्रेम को मना नहीं कर सका।

शाम को जब मास्टरजी घर लौटे तो उनका हाथ खाली था। माँ ने तुरंत पूछा- "तिल्ली कहाँ है?”

"बाजार में थी नहीं शहर से लाना पड़ेगा!” मास्टर जी ने जवाब दिया। माँ ने झटपट पड़ोसियों के घर चक्कर काटना शुरू कर दिया और कहीं से भी तिल्ली का इंतजाम कर लिया और रात के 9:00 बजे तक सारे पकवान बनाकर तैयार कर दिए और थैला तैयार कर रख दिया।

अमरकांत ने पिताजी को बताया कि सुबह की पहली ट्रेन पकड़नी होगी और आगे स्टेशन पर ट्रेन बदलनी भी है आखिर दो दिन तो पहुँचने में लग ही जाएंगे। उनकी बातें सुनकर माँ ने कहा- "पांच दिन तो आने जाने में ही खराब हो जाते हैं क्या मतलब की नौकरी?”

अमरकांत ने कहा- "नौकरी दूर करूं या पास, छुट्टियां तो तीन-चार महीने में एक बार मिलती हैं।"

"अब की बार छ: महीने में आए हो तुम” माँ बोली।

"दीपावली पर भी छुट्टियां लगाई थीं मगर मिल नहीं सकी।"

माँ बोली - "यही चोचले हैं। पिछले तीन साल में एक भी त्योहार घर पर नहीं किया है।"

"ठीक है छोड़ो, मैं तो सुबह की पहली ट्रेन से निकलूंगा कोहरा से ट्रेन आगे पीछे भी हो सकती है।"

इतना सुनकर माँ चुप हो गई, जाते-जाते कहाँ बहस करो।

खुशी की रवानी अच्छी। अमरकांत अगले सुबह तैयार होकर माँ पिताजी के चरण स्पर्श कर ट्रेन की ओर निकला। ट्रेन में बैठते ही अमरकांत को माँ की बात बार-बार ध्यान आ रही थी। सबसे ज्यादा तो वह बात मन में आती सभी लोग जहां एक साथ रहते हैं वही परिवार होता है। ट्रेन में दिनभर अमरकांत माँ को सोचता रहा ना जाने क्यों माँ जब बच्चे के पास रहती है तब इतना लगाव नहीं रहता। लेकिन बच्चे का माँ से दूर होते ही माँ के प्रति लगाव दोगुना हो जाता है।

...पीछे | आगे....

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

लोगों की राय

No reviews for this book