पलायन - वैभव कुमार सक्सेना Palayan - Hindi book by - Vaibhav Kumar Saxena
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पलायन

वैभव कुमार सक्सेना

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15417
आईएसबीएन :978-1-61301-680-0

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गुजरात में कार्यरत एक बिहारी मजदूर की कहानी

7

अगली सुबह अमरकांत ने यात्रा के नक्शे को सुधारते हुए ऋषिकेश की यात्रा करते हुए शाम को वापस अपने घर की ट्रेन पकड़ना उचित समझा। सुबह-सुबह ही अमरकांत के पास दीप्ति का फोन आया। अमरकांत ने दीप्ति का फोन उठाना उचित नहीं समझा। आखिर इतना ज्यादा लगाव भी अच्छा नहीं । अमरकांत के मन में विचार यात्रा के साथ-साथ चल रहे थे। अमरकांत एक अलग ही दुनिया सोच रहा था। बिहार के बिहारी और गुजरात के गुजराती आखिर क्यों दोनों समुदायों में अलग-अलग मनोदशा है और मेरे मन की भी क्यों वही दशा होती जा रही है।

अमरकांत परिवार के साथ वापस बिहार पहुँच गया और दो दिन तक लंबा आराम किया। माँ अमरकांत के वापस जाने की तारीख से वंचित थी और अमरकांत ने जिस पल ही वापस जाने की बात कही माँ सहमा उठी।

माँ ने कहा- "कुछ दिन और रुक जाओ।"

अमरकांत ने माँ को कहा- "नहीं नहीं ! नौकरी मतलब जिम्मेदारी। मुझे छुट्टी खत्म होने तक पहुँचना ही पड़ेगा नहीं तो मेरे ऊपर कार्यवाही हो सकती है और मुझे गैर जिम्मेदार ठहरा दिया जाएगा।"

माँ ने कहा- "तो साहब से बात क्यों नहीं कर लेता, थोड़ी छुट्टियां और बढ़ा देंगे।"

"नहीं-नहीं माँ, साहब नहीं देंगे। मुझे मालूम है छुट्टियों की बात करने से कोई फायदा नहीं।"

"साफ क्यों नहीं कहता, छुट्टियां देने लगे साहब तो साहब को साहबगीरी छोड़कर तेरा काम जो देखना पड़ेगा।"

"बात तो सही है” अमरकांत ने धीरे से बोला।

माँ के मन को अमरकांत अच्छे से समझ गया था माँ चाहती थी कि अमरकांत नौकरी छोड़ दे और उसके पास ही रहे लेकिन कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। माँ डरी हुई थी कहीं उसके अति प्रेम में अमरकांत का भविष्य खराब ना हो जाए।

इतने में अमरकांत के पिताजी आ गए। अमरकांत की पिताजी के साथ भोजन करने की इच्छा थी। अमरकांत ने माँ को बोला, माँ भूख लगी है झटपट भोजन लगा दे।

अमरकांत की बात सुन माँ तुरंत रसोई में गई और बेटे को अपने हाथ का खाना खिलाने की इच्छा को बाहर निकालने लगी। पिताजी और अमरकांत को गरम-गरम रोटियां परोसती । जैसे ही माँ अमरकांत के पास चौथी रोटी लेकर पहुँची अमरकांत ने बस कह दिया।

माँ ने कहा –"बस तीन रोटी खाता है।"

अमरकांत बोला- "हां ! बस तीन ही खिलती है। तीन सुबह, तीन शाम आखिर कुर्सी की नौकरी है। खाना पचता नहीं और वहां का जीवन बहुत व्यस्त है कसरत करने को, घूमने को वक्त नहीं मिलता।"

अब माँ से रहा नहीं गया और बोल ही दिया- "जब तीन रोटी खाता है तो नौकरी छोड़ क्यों नहीं देता, तीन रोटी तो यहां भी मिल जाएंगी।"

अमरकांत बोला, "यहां क्या काम करूंगा? छोटा सा शहर है मेरी पढ़ाई के लायक यहां कुछ भी काम तो नहीं और मेहनत मजदूरी करने का अब मेरा बिल्कुल भी मन नहीं। पढ़ लिख कर भला कौन अब मेहनत मजदूरी करेगा।"

माँ ने तेज आवाज कर बोला- "तो ठीक है तो हमें भी पैसे की कोई जरूरत नहीं। पहले के जमाने में एक कमाता था दस बैठ कर घर खाते थे और आजकल तो देखो दस के दस कमा रहे हैं और एक घर पर नहीं है। परिवार तो वह होता है जहां सभी लोग एक साथ रहें, घर का एक अंश भी घर से दूर है तो परिवार अधूरा लगता है।"

अमरकांत ने इठलाते हुए कहा- "पापा जी से पूछा है, नौकरी छोड़ने से  समाज के लोग क्या कहेंगे? आज मेरे नौकरी करने से समाज में पिताजी का स्वाभिमान है वरना कौन किसको पूछता है।"

माँ ने कहा- "ऐसे स्वाभिमान का भी क्या फायदा त्रिपाठी जी का लड़का अभी तक घर नहीं लौटा। एक है इकलौता, पढ़ा-लिखा दिया और अमेरिका भेज दिया आज माँ की हालत यह है कि उनकी देखभाल में अकेले त्रिपाठी जी ही लगे रहते हैं लड़का सिर्फ एक बार आया, आकर देखकर चला गया”।

"तो उसको रुक जाना चाहिए था माँ-बाप को देख कर ही क्यों चला गया।"

"अरे! उसके साहब कहां से छुट्टी देते, जैसे तेरे साहब नहीं दे रहे।"

"तो फिर उनको अमेरिका ही ले जाना चाहिए था।"

"अरे! अमेरिका क्यों नहीं ले जा रहा है, यह तो वही जाने हो सकता है वहां का जीवन यहां से भी ज्यादा दुष्कर हो।"

अमरकांत ने कहा – "नहीं नहीं, यह होगा कि अमेरिका की नागरिकता इतनी आसानी से नहीं मिलती और हो सकता है त्रिपाठी जी की बहू ने भी इंकार कर दिया हो।"

माँ बोली- "तो नौकरी छोड़ क्यों नहीं देता? त्रिपाठी जी की तो इतनी संपत्ति है उसी में राज करे। पैसे को क्या खाएगा।"

"ठीक है ! तुम तो छोड़ो मुझे, कल की ट्रेन रिजर्व करना है मैं स्टेशन जाकर आता हूँ।"

माँ को अमरकांत की जाने की बात से ऐसा मालूम हुआ मानो काम बहुत है और समय नहीं। माँ ने झटपट बड़े बेटे को दफ्तर से घर बुलाना चाहा मगर पड़ोस में कोई ऐसा बच्चा नहीं दिखा जिसके हाथ संदेशा भेज सकें तभी चबूतरे पर बैठे ताकती रहीं, कहीं कोई दिख जाए।

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