पलायन - वैभव कुमार सक्सेना Palayan - Hindi book by - Vaibhav Kumar Saxena
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पलायन

वैभव कुमार सक्सेना

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15417
आईएसबीएन :978-1-61301-680-0

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गुजरात में कार्यरत एक बिहारी मजदूर की कहानी

6

अमरकांत अगले दिन सुबह जल्दी उठ खड़ा हुआ और सभी परिवार जनों को तैयार होने का आग्रह करने लगा। अमरकांत को डर था कि कहीं उसके देरी करने के कारण दीप्ति का इंटरव्यू न छूट जाए। थोड़े ही समय में अमरकांत के परिवार जन सभी तैयार हो गए। अमरकांत ने तुरंत ही होटल खाली कर देहरादून की बस पकड़ी।

दीप्ति सुबह से अमरकांत के फोन का इंतजार कर ही रही थी कि अमरकांत का फोन आया ।

अमरकांत- "हैलो!"

दीप्ति- "गुड मार्निंग ! कब तक पहुँच रहे हो?”

अमरकांत- "बस में बैठ गया हूँ थोड़े ही समय में देहरादून पहुँच जाऊंगा।"

दीप्ति- "ठीक है में पिताजी के साथ बस स्टैंड पहुँचती हूँ।"

अमरकांत के देहरादून पहुँचते ही दीप्ति का वापस फोन आया। अमरकांत ने कहा- "मैं पहुँच गया! क्या तुम स्कूटी के पास खड़ी हो?”

दीप्ति ने कहा- "हाँ ! मगर तुमने कैसे पहचाना?”

अमरकांत ने कहा- "जादू है!”

और मुस्कुरा कर दीप्ति के सामने उसका बैग रख दिया।

दीप्ति के चेहरे पर खुशी दौड़ गई। दीप्ति अमरकांत से बहुत सारी बातें करना चाहती थी मगर दीप्ति के पास अमरकांत से इतनी बातें करने का समय नहीं था। दीप्ति ने अमरकांत को अपने पिताजी के साथ उनके दोस्त के घर जाने का आग्रह किया।

अमरकांत ने कहा- "नहीं नहीं! हम लोग मसूरी निकल रहे हैं। मेरा सामान कहाँ है?"

दीप्ति ने कहा –"आपका सामान भी घर पर ही है और मैं इंटरव्यू के लिए निकल रही हूँ। आप सभी लोग घर चले जाओ।"

दीप्ति के पिताजी बोले- "हाँ! हाँ! ज्यादा दूर नहीं है घर। थोड़ा आराम कर निकल जाना वैसे भी मसूरी में शाम को ही अच्छा लगता है।"

अमरकांत ने अपना सामान लेने के कारण दीप्ति के पिताजी के दोस्त के घर जाना ठीक समझा।

अमरकांत के पिताजी माँ व भाई को अब सारी बात समझ आ गई। क्यों अमरकांत सुबह-सुबह मसूरी घुमाने ले आया?

घर पहुँचते ही पहले पानी आया ठंड में ठंडा, फिर गर्म-गर्म चाय आती है। दीप्ति के पिताजी ने बताया कि पराग भाई उनके दोस्त हैं वह अहमदाबाद के ही रहने वाले हैं। इनके बेटे की देहरादून में नौकरी लग गई इसलिए वह यहां रहने लगे। पहले हम दोनों की अहमदाबाद में पास-पास में ही दुकान थी।

दीप्ति के पिताजी ने अमरकांत के पिता जी से पूछा कि वह कहां से है। पिताजी ने गर्व से कहा- "बिहार !”

दीप्ति के पिताजी ने बताया कि गुजरात के हर शहर में बिहारी हैं। "हमारे पुराने वाले घर में भी 3 वर्ष से एक बिहारी परिवार किराए से रह रहा था।"

अमरकांत ने तुरंत सवाल किया- "अभी कहां गया?”

दीप्ति के पिताजी ने बताया साबरकांठा कांड के बाद उन्होंने उनसे घर खाली करा लिया। घर खाली करने में उन्होंने थोड़े नखरे तो किए लेकिन आखिर खाली करना ही पड़ा । और अब ऐसे समय में कौन उनको किराए से घर देता? वो वापस बिहार को पलायन कर चुके हैं।

अमरकांत का मन गुजरातियों का बिहारियों के प्रति असम्मानजनक व्यवहार से दुखी हो चुका था। अब अमरकांत ने स्वयं का सामान लेकर मसूरी जाने की बात कही।

दीप्ति के पिताजी ने अमरकांत से कहा- "नहीं नहीं, इतनी जल्दी नहीं खाना खाकर ही जाना। तब तक दीप्ति भी आ जाएगी।"

अमरकांत ने पुन: कहा- "नहीं नहीं! हम निकलते हैं फिर देरी हो जाएगी।"

दीप्ति के पिताजी बोले, "अरे नहीं दीप्ति आपको मुझे संभला कर गई है दीप्ति के आने तक मैं कैसे भी नहीं जाने दे सकता। तब तक खाना तैयार भी हो जाएगा बस एक दो घंटे की बात है।"

दीप्ति के पिताजी ने आखिर अमरकांत को रोक ही लिया। अमरकांत को ऐसा मालूम हुआ जैसे दीप्ति के पिताजी असम्मान कर घर से निकाले गए बिहारी परिवार का पश्चाताप कर रहे हों।

थोड़े समय में ही अमरकांत के पिता जी की दीप्ति के पिताजी व उनके दोस्त के साथ खूब जम गई।

समय व्यतीत होते पता भी नहीं चला कि दीप्ति भी घर आ गई।

दीप्ति के हाथ में बढ़ा सा मिठाई का डिब्बा था और दीप्ति ने बताया कि छ: लाख सालाना के पैकेज पर उसे नौकरी दे दी गई है। अमरकांत ने खुशी जाहिर करते हुए बधाई दी। सभी ने दीप्ति को बहुत सारा प्यार दिया। अमरकांत की माँ ने दीप्ति को मिठाई खिलाई। दीप्ति अमरकांत की माँ से गले लिपट गई।

अमरकांत ने खाना खाकर मसूरी जाने की बात कही। दीप्ति के चेहरे पर तुरंत उदासी आ गई। दीप्ति ने कहा- "क्या इससे पहले तुम मसूरी नहीं गए?”

अमरकांत ने कहा – "नहीं ! ये हमारा पहली बार है।"

दीप्ति ने कहा- "कुछ नहीं हे मसूरी में हम आपको आज देहरादून घुमा देते हैं। क्यों पिताजी?”

अमरकांत ने कहा- "नहीं नहीं, हम तो मसूरी ही जाएंगे। सभी की इच्छा है।"

दीप्ति के पिताजी ने बात को संभालते हुए कहा- "क्यों ना हम भी मसूरी चलें?” दीप्ति के पिताजी घूमने में अच्छा खासा दिलचस्पी रखते थे। ठहाका लगाकर बोले – "दो बार तो हम घूम आए अगर तुम चाहो तो एक बार फिर चलें।"

दीप्ति ने कहा – "ठीक है हम भी चलते हैं।"

फिर सभी लोग एक साथ खाना खाकर मसूरी के लिए रवाना हुए।

दीप्ति के पिताजी ने बताया कि मसूरी के उत्तर-पूर्व में हिम मंडित शिखर सिर उठाये दिखाई देता है वहीं दक्षिण में दून घाटी और शिवालिक श्रेणी दिखती है। इसी कारण यह शहर पर्यटकों के लिये परीमहल जैसा प्रतीत होता है। मसूरी गंगोत्री का प्रवेश द्वार भी है और मसूरी को पर्वतों की रानी भी कहा जाता है।

मसूरी में परिवार के साथ समय कैसे व्यतीत हो गया अमरकांत और दीप्ति को पता ही नहीं चला। शाम तक मसूरी से वापस आते-आते देर रात हो गई। अमरकांत अपने परिवार के लिए होटल भी बुक कर चुका था। मसूरी से वापस देहरादून पहुँचते ही अमरकांत ने होटल की ओर रुख किया।

दीप्ति ने अमरकांत के होटल जाते समय एक बार भी अमरकांत से बात नहीं की। ठंड बढ़ चुकी थी और जैसे मानो दीप्ति को घर जाने की जल्दी थी। अमरकांत को बुरा लगा और आखिर चाहकर भी अमरकांत को वह कैसे होटल जाने से रोकती क्योंकि वह एक लड़की है। दीप्ति के पिताजी ने दोस्त से अमरकांत को उनके घर ठहरने की बात करना उचित नहीं समझा। अमरकांत होटल में चला गया अपने परिवार का सामान रखकर कमरे की बाल्कनी में जा पहुँचा।

अपने कमरे की बाल्कनी से खुले आसमान में सितारों की ओर देखता और बार-बार दीप्ति को उन सितारों में ढूंढ़ता। दीप्ति के प्रति अमरकांत के मन में कई तरह के विचार आ रहे थे मगर अमरकांत सितारों के पास अंधेरा देखकर डर जाता।

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