पलायन - वैभव कुमार सक्सेना Palayan - Hindi book by - Vaibhav Kumar Saxena
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पलायन

वैभव कुमार सक्सेना

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15417
आईएसबीएन :978-1-61301-680-0

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गुजरात में कार्यरत एक बिहारी मजदूर की कहानी

3

अगले स्टेशन ट्रेन पहुँची कि एक काला कोट पहने आदमी अंदर आ गया और सबसे बोला- यह डिब्बा खाली करो यह विकलांग डिब्बा है।

मगर उसी पल मुसाफिरों ने आवाज तेज करते हुए कहा – "कहां चले जाएं तुम्हारे सर पर जाकर बैठ जाएं। किसी भी डिब्बे में जगह खाली नहीं।"

एक बोला, "हमारे टिकट के पैसे वापस दे दो इस रेल से भले तो हम बस में ही अच्छे । साला इतनी मेहनत करो, मजदूरी करो और ट्रेन में बैठो तो जेल की तरह। हम ना सुनें किसी की।"

तभी टीसी अमरकांत के समीप आया और बोला- "तुम तो पढ़े-लिखे मालूम होते हो तुमको नहीं दिखता बाहर लिखा है विकलांग डिब्बा और केवल विकलांग ही चढ़ें।" उस समय अमरकांत पढ़े-लिखे होकर भी अनपढ़ बनना ज्यादा उचित समझ रहा था। कम से कम खुलकर जवाब तो दे सकता था।

फिर एक मूछों वाले गार्ड ने काले कोट के सन्नाटे भरे डिब्बे में तेज से आवाज लगाकर बोला – "बैठ रहे हो डिब्बे में तो ठीक है। मैं पिछले डिब्बे में ही हूँ अगर किसी विकलांग को किसी भी प्रकार की तकलीफ हुई तो सब को डिब्बे से बाहर कर दूंगा।"

अब विकलांगों की आवाज तेज हो गई आखिर चुनाव में कम संख्या होने के बाद भी सरकार जो उनकी आ गई थी।

एक विकलांग ने कड़क आवाज करके बोला- "हटो! मुझे पेशाब लगी है।"

सभी लोग उसके लिए रास्ता तैयार करने लगे। उसने अपनी वैशाखी उठाई और अपने साथी के साथ कालीन पर पांव रखते हुए आगे बढ़ा। सभी उसको ऐसे देख रहे थे मानो सचमुच राष्ट्रपति की सवारी हो और सभी बीच-बीच में सहानुभूति करने के लिए "आराम से, आराम से निकलने दो!” की आवाज करते। जैसे ही राष्ट्रपति पेशाब महल के पास पहुँचा तो देखा पेशाब महल लोगों से जमकर भरा हुआ था। फिर वह तेज आवाज कर कड़ाके से बोला- "बाहर निकलो सभी, मुझे पेशाब करना है।"

जब सभी लोग बाहर निकले तो ऐसा लगा मानो ट्रेन दूसरे स्टेशन पर जाकर पहुँच गई। क्योंकि इतने लोग चढ़ने का साहस तो प्रत्येक स्टेशन पर करते ही थे। विकलांग मन ही मन खुश हो रहा था क्योंकि जब भी उसे पेशाब लगती तो ऐसा लगता जैसे राष्ट्रपति बनकर महल की सवारी करने जा रहा हो। आधा एक घंटा खत्म होता ही कि सभी लोग सोचते कि अब किसी विकलांग को पेशाब ना लगे लेकिन फिर कोई वैशाखी लिए खड़ा हो जाता।

ट्रेन धीरे-धीरे चलती रही। अभी रात के 2:00 बजे एक विकलांग उतरने को आया तभी नीचे बैठे एक हाथ के मुसाफिर ने कहा ऊपर चले जाओ, ऊपर खाली हो रही है। अमरकांत फटाक से बंदर बन जा पहुँचा। अब सभी समझ रहे थे कि वह विकलांग है इसी कारण किसी ने पूरी रात अमरकांत को बिल्कुल भी नहीं टोका। विकलांग ना होकर भी थोड़े समय बाद उसे मालूम हुआ कि वह विकलांग हो गया। सीट के गोल-गोल चमकदार स्टील के पाइप अमरकांत की पीठ में चुभ रहे थे। सीट छत के इतने करीब थी कि वह बैठ भी नहीं सकता था। अमरकांत को रेल के उस सीट को डिजाइन करने वाले पर गुस्सा आ रहा था। क्यों ना पटिये की ही सीट बना देता। आधुनिक भारत करने के चक्कर में गरीबों की सीट भी बिगाड़ दी। अमरकांत भारतीय रेल व्यवस्था पर खूब नाराज था।

अमरकांत का भाई स्टेशन पर ट्रेन के समय के दो घंटे पहले ही पहुँच गया। स्टेशन आते ही अमरकांत का मन हर्षोल्लास से भर गया। अमरकांत जैसे ही ट्रेन से उतरा तो केवल भाई को देखकर उसका मन थोड़ा सा उदास हुआ। उसे लगा था कि एक से अधिक लोग उसे लेने पहुँचेंगे।

भाई ने सामान को अमरकांत के हाथ से लेकर घर की और कदम बढ़ाए। रास्ते चलते अमरकांत के जीवन से जुड़े प्रश्न होते रहे। वह सभी प्रश्नों का उत्तर सहानुभूति से देता रहा।

घर पहुँचते ही द्वार के पास खाट पर बैठे पिताजी पर नजरें गई तो जिस खुशी व आनंद का उसको विश्वास था पिताजी की आँखों में उतना नजर नहीं आया। ऐसा लगा मानो पिताजी अपने जीवन में कर्तव्यों का पालन करते-करते थक चुके हों और खाट पर जाकर बैठ गए हों और सोच रहे हों कि उन्होंने संपूर्ण जीवन में क्या पाया, कुछ भी तो नहीं ।

माँ, माँ के करीब तो बच्चे को कभी जाने की जरूरत ही नहीं, माँ बच्चे की आवाज सुनकर खुद ही बच्चे के पास आ जाती है और वही हुआ, झटपट घर से बाहर निकल कर माँ अमरकांत से गले लिपट गई। थोड़े ही समय में माँ की आँखों से आंसू की फुहार निकल आई। जैसे इस पल का इंतजार कर ही माँ अपना समय व्यतीत कर रही हो।

तभी अमरकांत को बहुत बड़ी भूल याद आई- "अरे मैं तो जल्दी-जल्दी में तुम्हारे लिए कुछ लाना ही भूल गया। सच बताएँ तो घर आने की खुशी में कुछ ध्यान ही नहीं रहा।"

माँ बोली- "अरे तुम खुद आ गए इससे बड़ा उपहार क्या है मेरे लिए।"

पीछे से भाई ने चुटकी लेकर कहा- "पैसे कमा कर लाया होगा ना यहीं कुछ दिला देना, पैसे से क्या नहीं मिलता?” अमरकांत के मन में भाई की बात सुनकर संतोष आया।

अमरकांत ने हर पल घर से दूर रहकर भी हमेशा घर को ही महसूस किया है। बस उसे अंतर इतना लगा वहां पर मन अशांत था घर आकर मन शांत हो गया। अमरकांत के मन में बस अब एक ही लक्ष्य था कि सब को खुश कैसे किया जाए। अमरकांत के घर छोड़कर जाने से जैसे सब लोग बीमार से हो गए हों।

अमरकांत ने माँ से खूब सारी बातें करीं, जैसे बातों ही बातों में अमरकांत ने माँ को गुजरात दिखा दिया हो। अमरकांत ने माँ से धीरे-धीरे बुआ, चाची, मौसी सब का हाल-चाल पूछना शुरू किया। पूछते पूछते उसका मन अम्मा पर आकर टिक गया। वह बार-बार पूछता अम्मा किसके साथ रह रही है। अम्मा आखिर परिवारजनों के साथ क्यों नहीं रह रहीं। भला अकेली क्यों है? माँ कहती- "क्या जानूँ मैं तू ही पूछ लेना।"

अमरकांत ने निश्चय किया कि वह कल सुबह ही पहली भोर अम्मा के पास जाएगा।

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