मंजरी - आशापूर्णा देवी Manjari - Hindi book by - Ashapurna Devi
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मंजरी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15409
आईएसबीएन :0000000000

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आशापूर्णा देवी का मर्मस्पर्शी उपन्यास....

37

आखिरी प्रश्न उसने इतने अनमने ढंग से किया कि लगा खुद ही से पूछ रहा हो।

फिर भी सुरेश्वर गुस्से से बोला, "नहीं कर सकेंगे यह बात आप जोर डालकर कह सकेंगे क्या अभिमन्यु दा? यह बात भी तो परिवेश पर निर्भर करती है।"  

"शायद फिर भी प्यार में नुकसान जैसी कोई चीज नहीं है। जैसे मेरा तुम्हारा प्रेम... तुमने मुझे रास्ते से उठाया और इतना प्यार करने लगे। लेकिन आज अगर तुम्हारे साथ मेरा मतांतर हो और तुम मेरा त्याग कर दो फिर भी तुम मुझसे ये दिन तो वापस नहीं ले सकोगे? ये दिन तो मेरे पास ही रहे न? ये दिन अमूल्य हैं। अगर बाकी के दिनों में तुमसे भेंट नहीं हुई तो तकलीफ होगी लेकिन यह जीवन खो नहीं जाएगा।"

अभिमन्यु मेज पीट-पीटकर तर्क नहीं करता है इसलिए शायद उसे तर्क में हराना मुश्किल है। उसके लिए 'विश्वास' ही एकमात्र सत्य है।

यद्यपि सुरेश्वर हार नहीं मानता है। लेकिन समस्या का समाधान भी नहीं होता है।

अभिमन्यु स्वीकार करता है कि उसने गलती की है। मंजरी के भले बुरे की जिम्मेदारी से मुंह फेर लेना उचित नहीं था। उस गलती का मुआवजा कुछ कम नहीं भरा है पर उस भूल को अब सुधारा नहीं जा सकता है। बाकी बची जिंदगी के लिए अभिमन्यु ने नए सिरे से कर्म तपस्या की बात सोची है।

लेकिन अगर मंजरी अपनी गलती को समझकर वापस लौट आना चाहे तो? मेरा दरवाजा खुला है, और हमेशा खुला रहेगा।

क्यों फिर अभिमन्यु क्यों नहीं उस खुले मन और खुले दरवाजे को लेकर आगे बढ़ जा रहा है? मंजरी को अपनी तपस्या का रास्ता क्यों नहीं दिखा रहा है?

"ऐसा नहीं हो सकता है।"

सुरेश्वर कहता है, "गलती सुधारने का रास्ता कभी बंद नहीं होता है।"

अभिमन्यु हंसता है।

"सुधारने की प्रवृति हर एक की अलग-अलग होती है।''

अतएव एक तर होने लगी विवाह की तैयारी दूसरी तरफ प्रवास यात्रा की तैयारी। हालांकि अभिमन्यु अपने ही घर में रह रहा था जहां केवल सेवक श्रीपद ही सहारा था।

तीन महीने की तनख्वाह और अतिरिक्त सौ रुपये मालती के हाथ में देकर वनलता बोली, "तू अगर घर जाना चाहती है तो कुछ दिनों के लिए हो आ मालती। वरना जितने दिनों तक दूसरा कोई काम नहीं मिलता है, इसी से काम चलाना।''

मालती ने कातर भाव से भीगी आंखों को पोंछा।

"तुम जो मुझे भी जीवन भर के लिए विदा कर दोगी, अपने साथ नहीं ले जाओगी, यह मैंने सोचा नहीं था दीदी। मैंने कौन सा अपराध किया है?"

"तेरा क्या अपराध होगा?'' वनलता बोली, "तुझे जब तक विदा नहीं करूंगी तब तक 'वनलता राक्षसी' विदा न हो सकेगी। तू उसे भूलने न देगी-जिला रखेगी। इसीलिए मथुरा, वृंदावन, द्वारिका रामेश्वरम जहां भी जाऊंगी 'वनलता' मेरे साथ-साथ धावा करती फिरेगा, मुझे मुंह चिढ़ाएगी।"

मालती ने आंखें रगड़ते लाल कर डालीं। बोली, "पता नहीं दीदी, किस बात से क्या हो गया अचानक। न जाने किसी ने जादू टोना तो नहीं कर दिया। आजकल में तुम्हारी बातों का मतलब नहीं समझ पाती हूं। न कहना न सुनना, अचानक न जाने क्यों यौवन में जोगन का वेश पहन बैठीं। यह सब क्या अभी करता है आदमी? तीर्थ धरम करने के लिए तो सारी उम्र पड़ी है। वह नई दीदी, अरे वही मंजरी दीदी तुम्हारे आश्रय में आकर तुम्हारा राजपाट देखकर ईर्ष्या-ईर्ष्या में दो दिन के भीतर कितना नाम कर लिया। और तुम हो कि जान-बूझकर, वही राजपाट छोड़ सिर्फ थान धोती पहन तीर्थवासिनी होने जा रही हो? देखकर मेरे तो प्राण रो रहे हंआ दीदी।"

वनलता जल्दी से बोली, "दुहाई है, तू और चाहे जो करे पिनपिन करके रो मत। चुप हो जा। और ले ये हार ले ले, अपनी लड़की को देना।"

थियेटर के मैनेजर सिर पकड़कर दौड़े आए बोले, "अरे सर्वनाश यह क्या सुन रहा हूं? तुम क्या मुझे मार डालना चाहती हो? तुम चली गईं तो मैं किसके बलबूते पर थियेटर चलाऊंगा?''

हंसी वनलता।

बोली, "राजा के बिना राज्य चलता है और मेरे बिना आपका थियेटर नहीं चलेगा? एक राजा जाएगा तो दूसरा राजा आएगा... ''

"आएगा तो लेकिन मेरी खोपड़ी में जितने बाल बचे हैं वह सब गिर जाएंगे। कुछ दिनों बाद ही तो हमारा 'नव गौरांग' का चार सौ नाइट का प्ले है। कम-से-कम ये थोड़े दिन... ''

वनलता हाथ जोड़कर बोली, "माफ कीजिएगा मैनेजर साहब संभवत: आपके ये चार सौ नाइट की रातों से बचने के लिए ही भाग रही हूं। हम ठहरे अभिनेत्री हमारे खून में नित्य नए का नशा है। हर रात, एक ही शो, एक ही वधू और उसका बासर गृह, अब असह्य लग रहा है। मेरा दम घुटने लगा है।"

मैनेजर आश्वासन देते हुए बोले, "अरे भई, नई कहानियां क्या नहीं होगी? आज भी लोग इस नाटक का टिकट नहीं पा रहे हैं, वापस लौट रहे हैं, मैं इसे कैसे बंद कर दूं?"

"बड़ी मुश्किल है। बंद क्यों करेंगे? लेकिन जब तक आपकी नई कहानी शुरू होगी क्या पता मर चुकी होवूंगी।"

अब मैनेजर अविश्वास के स्वर में बोले, "सिर्फ क्या इसीलिए तुम थियेटर करना छोड़ रही हो वनलता?"

"किसने कहा छोड़ रही हूं?'' वनलता मुस्कराई। बोली, "यह भी तो थियेटर करना है। अभी तक आपके स्टेज पर वैष्णवी का स्टेज प्ले किया करती थी, अब एक-दूसरे मैनेजर के स्टेज पर वैरागिनी का पार्ट अदा करूंगी। अभी तक आपके गैलरी में बैठे लोगों का ध्यान आकर्षित करती रही हूं अब अपने मन को आकर्षित करूंगी। बस इतना ही फर्क होगा।"

फिर भी मैनेजर ने बहुत समझाया, हाथ जोड़े। बदले में वनलता ने कई-कई बार हाथ जोड़े। अंत में वे सज्जन मन-ही-मन गालियां देते हुए चले गए।

अब वनलता कागज कलम लेकर एक चिट्ठी लिखने बैठी। लिखा मंजरी को।

लिखा, "पता नहीं क्यों, जाते वक्त तुझे एक बार देखने की बड़ी इच्छा हो रही है। सुनकर हसेगी तो नहीं-मैं अभी गले में तुम्हारी की माला डालकर जा रही हूं वृंदावन। अनपढ़ मूर्ख हूं ठीक से समझा न सकूंगी, फिर भी बहुत सोचने के बाद क्या समझ सकी हूं पता है? मनुष्य की अंतरात्मा हमेशा के लिए धूलमिट्टी लेकर भूला नहीं रह सकता है। वह लगातार, जो अच्छा है जो सत्य है, पवित्र है उसके लिए सिर पीटता रहता है। थियेटर में काम करते-करते मैं शायद थियेटर वाली भाषा बोल रही हूं-है न? खैर तेरे से क्या शर्म? लगता है, शायद आनंदकुमार निशीथ राय भी इसी दौर से गुजर रहे हैं। फर्क इतना है कि समझ न सकने की वजह से गलत रास्ता पकड़कर भाग रहे हैं। इसीलिए कहती हूं कोई किसी पर आरोप लगा कैसे सकता है? किसने हमें उस विचारक के आसन पर बैठाया है? फैसला न सुनकर हमने विश्वास का रास्ता पकड़ा होता तो अब तक शायद सब कुछ आसान हो जाता।"

सोचा था, आगे लिखेगी "त्याग और पवित्रता, इसके आगे हार मानना ही पड़ता है सबको। अगर इनकी नौकरी छोड़कर मैं किसी और कंपनी में काम करने जाती तो अवश्य ही ये मैनेजर मुझे गुंडे भेजकर मरवा डालता। इस क्षेत्र में केवल मन मारकर रह जाना पड़ा है उसे। यही है इंसान की प्रकृति," लेकिन इतनी बातें उसने लिखी नहीं। लिखने की आदत न होने की वजह से अंगुली में दर्द होने लगा।

बंबई से कलकत्ता।

ट्रेन से आने में भले ही वक्त लगे, हवाई जहाज से आने में कुछ घंटे मात्र न? उड़कर वनलता को क्या पकड़ न सकेगी? कह न सकेगी कि यह दीक्षा तुम मंजरी को भी दो न?

चिट्ठी हाथ में लेकर मंजरी नंप्रकाशजी के पास गई। चिट्ठी लिफाफे से निकाले बिना ही बोली, ''एक विशेष सहेली बहुत बीमार है, जाना ही पड़ेगा। आज हो जाए तो आज ही।''

''प्लेन में।''

''अवश्य ही।''

खीजकर नंदप्रकाशजी ने व्यंग किया, ''पैसेज जुगाड़ करना इतना आसान नहीं है।''

मंजरी ने विनीत भाव से कहा, ''अगर नितांत ही दिक्कत हो तो कल के लिए देख लीजिए। आप स्वयं कोशिश करेंगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी।''

आसानी से काम होने के पीछे रुपया है।

सारी इच्छापूर्ण का यही मंत्र है।

हर जगह इस मंत्र को पढ़ा जा सकता है और रास्ता आसान किया जा सकता है।

दूसरे दिन भोर के प्लेन से आकाश में उड़ान भरी मंजरी ने।

वह भी वनलता से एक बार मिलना चाहती थी।

लेकिन नहीं। सारी इच्छाएं रुपये से पूरी नहीं होती हैं। आकर देखा वनलता के फ्लैट में ताला लटक रहा है। कल ही उसने फ्लैट छोड़ दिया था और न जाने कहां चली गई थी। पुराना चौकीदार मिल गया, सलाम करते हुए बोला, ''नहीं, अपना कोई पता नहीं छोड़ गई हैं वनलता।''

स्तब्ध खड़ी बंद ताले की ओर देखती रही मंजरी। दरवाजा बंद था। यही तो उसके भाग्य का प्रतीक भी था। उसकी दुनिया का रूप कुछ ऐसा ही है।

कितने दिनों के लिए कलकत्ता छोड़कर चली गई थी मंजरी? थोड़े दिन ही तो हुए हैं। फिर भी सड़क पर चलते हुए चारों तरफ नजर दौड़ाने पर मंजरी को लगा कितने युग युगांतर के बाद फिर से स्वर्ग में आ गई है। कैसा अपूर्व दृश्य था चारों ओर।

कॉलेज स्ट्रीट, कालीतला, मेडिकल, कॉलेज, बगल की वह किताबों की दुकान-विवेकानंद रोड के मोड़ का बसस्टॉप, शर्बत की दुकान, स्टेशनरी की दुकान, सब जहां की तहां हैं। आश्चर्य की बात तो ये है कि सभी मानो परिचित आत्मीय की तरफ हंसकर स्वागत कर रहे हैं, ''अरे आओ आओ, कहां थी अब तक?''

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