Manjari - Hindi book by - Ashapurna Devi - मंजरी - आशापूर्णा देवी
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मंजरी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15409
आईएसबीएन :0000000000

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आशापूर्णा देवी का मर्मस्पर्शी उपन्यास....

38

सच, कहां थी इतने दिनों तक मंजरी?

वह क्या एक शहर था? या कि पूरा का पूरा स्टूडियो था? मंजरी के लिए तो सारा देश ही ममताहीन, प्राणहीन है। सारा का सारा अखंड स्ट्रडियो का रूप धारण कर चुका है। इससे ज्यादा कुछ नहीं।

और यहां सर्वत्र जीवन है, जीवन का स्पर्श है। यहां मंजरी की सारी सत्ता अणु परमाणु के रूप में घुल मिल गई है। यहां आशा जागती है-शायद फिर से जीया जा सकता है। शायद अभी भी यहां मंजरी के लिए स्थान है।

बड़ी देर से टैक्सी ड्राइवर टैक्सी चला रहा था। पीछे से न प्रतिवाद आया था, न किसी ने सड़क का निर्देश दिया था। अब उसने खुद ही प्रश्न पूछा कि जाना कहां है?

और उसी असर्तक मुहुर्त में मंजरी ने जो पता बता दिया, एक मिनट पहले तक क्या उसने सोचा था कि वहां जाएगी?

मकान से निकला तीर और मुंह से निकली बात-वापस नहीं लौटती है।

लेकिन उस विशेष मोड़ से पास पहुंचते ही सांस रुंधने लगी, वापस लौट चलने के लिए कहना चाहा तो चिल्ला उठी, ''मोड़ो मोड़ो इधर नहीं।''

''तब किधर?''

टैक्सी की गति धीमी करके खोजते हुए पूछा, ''आप ठीक से सोचकर बता दें कि कहां जाना है।''

इस धीमी गति का फायदा उठाया मंजरी। खिड़की से सिर बाहर निकालकर चोरी से देख सकती है उस पुराने तिमंजिले मकान के दुमंजिले के कमरे खुले है या नहीं, खिड़कियों से रोशनी दिखाई पड़ रही है या नहीं। घर के मालिक तो वापस लौट आए हैं।

''छोटी भाभीजी हैं न?''

चौंककर सिर खिड़की से भीतर कर लेने के बाद मंजरी ने साहस बटोरकर फिर सिर बाहर निकाला, ''कौन, श्रीपद?''

श्रीपद अचानक मंजरी को देखकर उच्छवसित हो उठा था और इसीलिए 'छोटी भाभी' पुकार बैठा था। अब संभलकर बोला, ''आप यहां आईं हैं क्या?''

कंठ स्वर में व्याकुलता और आग्रह झलकता है तो झलके जवाब तो उसे देना ही है, ''आई थी इधर। अरे सुनो सुनो, यह बताओ तुम लोगों का हाल-चाल अच्छा तो है?''

श्रीपद ने कठिनाई से हंसकर कहा, ''जी, वैसे तो एक तरह से सभी ठीक हैं। मां तो उस दिन से मझले भइयाजी के घर में ही हैं और छोटे भइयाजी अब तक भारत का कोना कोना छान लेने के बाद जा रहे हैं, अमेरिका। अब तो इतने बड़े मकान का राजा हूं मैं-श्रीपद।''

खड़े रहकर दो चार बातें करने की दुर्दमनीय इच्छा को दमन कर श्रीपद आगे बढ़ने लगा। नौकर है तो क्या हुआ, अपने लालचीपन का प्रदर्शन तो नहीं कर सकता है न?

मंजरी ने फिर एक बार व्यग्र भाव से पूछा, ''तुम्हारे गांव में सब कोई ठीकठाक हैं न?''

जैसे इसी चिंता से घुली जा रही है मंजरी।

श्रीपद ने उदासीन भाव से कहा, ''हूं।''

''ये पकड़ो, अपने बेटे को मिठाई खाने के लिए देना।''

दो दस रुपये के नीट बढ़ा दिए मंजरी ने।

श्रीपद ने चौंककर दांतों के बीच जीभ दबाई। वह यह सब नहीं ले सकता है-यह सब क्या कर रही हैं? अभी वह गांव जा कहां रहा है?

लेकिन आपत्ति ज्वार के बीच न जाने कैसे वह दोनों नोट श्रीपद की जेब में घुस भी गए।

''अमेरिका क्यों श्रीपद?''

''सुना है नौकरी करने। इतने बड़े भारत भूमि में उन्हें नौकरी नहीं मिली-ऐसा कैसे हो सकता है? असल में यह है देशत्याग।''

''कब जा रहे हैं?''

''कल।''

दूर से दिखाई दे रहा था। तेज कदमों से आते-आते दृश्य बदल गया। तब तक टैक्सी काफी आगे बढ़ गई थी।

श्रीपद उसी तरह खड़ा था।

विस्मित अभिमन्यु ने पूछा, ''किसकी मोटर रोककर बातें कर रहा था रे श्रीपद?''

सीने के पास नए वोट खड़खड़ा रहे थे।

सीने पर हथौड़े की चोट पड़ रही थी।

फिर भी निश्चित भाव से श्रीपद बोला, ''मैं क्यों रोकूंगा एक जना पूछ रहे थे मुक्ताराम बाबू की लेन किधर है?''

''ओ।''

और क्या हो सकता है? सच, प्रत्याशा इंसान को कितना मूर्ख बना देती है?

पहचाना चौकीदार था। ढेर सारा इनाम पाने की लालच में आकर उसने वनलता का फ्लैट खोल दिया। कमरे में कदम रखते ही मंजरी को जैसे किसी ने धक्का मारा। कैसी भयावह शून्यता। कहीं कुछ नहीं। घर का सारा सामान बांटकर बेचकर घर खाली करके चली गई थी वनलता। मंजरी के मन के उपयुक्त ही था घर।

न, एक चीज थी। शायद वनलता की नहीं थी। घर के मालिक की एक खाट। यही बहुत है। कमरे का दरवाजा भीतर से बंद करके रो सकेगी। शराबी का रोना नहीं। वेदना से भरा अश्रुजलहीन गहरी रुलाई।

बड़ी देर बाद उठकर बैठी मंजरी। ध्यान लगाकर जाप करने लगी, ''हे ईश्वर, साहस दो। मुझे आगे बढ़ने का साहस दो, अपमान सहन करने का साहस, मृत्यु की गुफा से सिर उठाकर पुनः जीवन पा लेने का साहस।''

अपने आपसे प्रश्न पूछ-पूछकर क्षत-विक्षत करके देख चुकी है मंजरी, जांच चुकी है खुद को। पहुंची है अंतिम सिद्धांत पर। अभिमन्यु को अस्वीकार कर जीना अर्थहीन है। अभिमन्यु को जीवन से निकाल दिया तो मंजरी की दुनिया में कुछ नहीं है। वह दुनिया गूंगी है, वेस्वाद और मृत है।

अभिमन्यु के अहंकार और ईर्ष्या को केंद्रित कर अभी तक मंजरी विभोर थी। उच्छृंखलता का आनंद, ध्वंस का आनंद-उसी में डूबी थी। अभिमन्यु को 'दिखा देने' के लिए ही ख्याति और अर्थ के घिनौने और कुत्सित बोझ को बटोर लेने का यह निर्लज्ज प्रयास था।

और आज अभिमन्यु के पास जाकर अपने को समर्पित कर देने की यह इच्छा, यह अंतरात्मा का सिर पीटना-

तब फिर लज्जा अभिमान के लिए समय कहां है मंजरी के पास?

''कौन?''

चौंककर मुंह घुमाया अभिमन्यु ने। दोबारा अस्फुट स्वरों में पूछा, ''कौन?''

सामने के पर्दे पर एक तस्वीर उभर आई।

निर्वाक, निश्चल।

शायद जीवंत होने के लिए शक्ति संग्रह कर रही थी।

बिजली की रोशनी में सांवला चेहरा सफेद दिखाई पड़ रहा था। बिस्तर छोड़कर अभिमन्यु उठकर खड़ा हो गया। फिर उसके मुंह से अस्फुट स्वर निकला,

''मंजरी।''

तस्वीर धीरे-धीरे चलकर पास आई, झुककर प्रणाम किया।

अब जाकर सचतेन हुआ अभिमन्यु। स्निग्ध कोमल स्वर में बोला, ''बैठो।'' एक कुर्सी खींचकर जरा सा खिसका दी।

ज्यादा देर तक खड़े रहने की क्षमता नहीं थी, मंजरी इसीलिए बैठ गयी। मुंह से एक शब्द नहीं निकला। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों को देखकर लग रहा था अभी झझराकर बरसने लगेंगे। होंठ कांप रहे थे, सीना जोरों से उठ बैठ रहा था, हाथ की अंगुलियां तक थरथर कांप रही थीं।

लेकिन नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ। न कुछ फट पड़ा, न कुछ उफन पड़ा। अभिमन्यु को उसने परेशान नहीं किया। केवल आंखें झुकाकर गर्दन घुमाए दूसरी तरफ मुंह फेरे बैठी रही।

अभिमन्यु ने उसी ममता भरी आवाज में धीरे-धीरे कहा, ''अचानक यहां आने की तुम्हारी इच्छा क्यों हुई। मैं यह प्रश्न तुमसे नहीं पूछूंगा मंजरी। केवल ऐसा लग रहा कि भगवान कभी-कभी हमारी बात भी सुन लेता है। जाने से पहले तुम्हें एक बार देखने की बड़ी इच्छा थी।''

क्यों ये करुणा? क्यों ऐसा ममता भरा कंठ स्वर?

मंजरी तो प्रस्तुत होकर आई थी कि सारा मान अभिमान विसर्जित कर कहेगी, ''मुझे अपने साथ ले चलो।'' आंखों में पानी नहीं आने देगी, आवाज को लड़खड़ाने न देगी केवल कहेगी, ''मुझे अपने साथ ले चलो।''

केवल यही चार पांच शब्द।

सहस्र बार इसी मंत्र को जाप किया था। सहस्रों बार मन-ही-मन उच्चारण किया था। सोचा था कहने के लिए कोशिश करने की जरूरत नहीं होगी, भीतर उच्चारित हो रही ध्वनि बाहर स्वयं ही निकल आएगी। पर नहीं हुआ।

उसके बदले क्षीण रुद्धकुंठ से यह प्रश्न निकला, ''उतनी दूर जाना क्यों पड़ रहा है?''

''दूर और पास क्या? जहां कहीं भी रहने से मतलब है।''

वह तो है।

लेकिन किससे दूर जा रहे हो?

अभिमन्यु ने फिर पूछा, ''कब आईं?''

वह मन-ही-मन सोच रहा था सुरेश्वर ने असाध्य काम किया है, इसे शादी में बुलाया है।

''कल।''

''वे लोग अच्छे तो हैं?''

''कौन?''

अवाक् होकर मंजरी ने पूछा।

''चंचला लोग।''

''उनकी बात तो मुझे मालूम नहीं।''

''ओ! तो फिर जाने वाली बात किसने बताई?''

''श्रीपद ने।''

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