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मंजरी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15409
आईएसबीएन :0000000000

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आशापूर्णा देवी का मर्मस्पर्शी उपन्यास....

20

गगन घोष ठहरे गहरे पानी की मछली लेकिन गुस्सा उन्हें भी आता है। वे क्रुद्ध कंठ से बोले, "बंबई जाना रोक सके इतना पैसा किसके पास है? कौन देगा? हमारी ललाटलिपि ही यही है। गधे पीट-पीटकर जब हम घोड़े तैयार कर देते हैं तब चील झपट्टा मारकर ले उड़ती है। गधा होने की वजह से उसमें तो कृतज्ञता के भाव रहते नहीं हैं।"

रिसीवर कान से लगाए वनलता खिलखिलाकर हंसने लगी, "रहेगा कहां से-गधा जो ठहरा। आपने कभी धोबी के प्रति गधे को कृतज्ञ होते देखा है?"

इसी तरह महीने गुजरते चले गए। मंजरी यहीं रह गयी और दोनों के बीच एक अद्मुत सुंदर सखित्व ने जन्म लिया।

लेकिन कैसे?

मंजरी तो हर समय वनलता की नीतियों का विरोध करती थी। उसकी उच्छृंखलता से घृणा करती थी। वनलता शराब पीकर मदहोश होती, रातों को पुरुष मित्रों को साथ ले आती अपने घर में उन्हें रखती, वनलता अजीब-अजीब तरह की पोशाकें पहनती-इन सब चीजों का कोई भी शरीफ घर की लड़की के लिए समर्थन करना कठिन था। फिर भी जब दूसरे दिन सुबह वनलता बेहूदे कपड़ों में, मेकअपविहीन फीका चेहरा लिए सोफे पर औंधी पड़ी मिलती और करुण दृष्टि से उसे देखकर पूछती, "तू मुझसे बहुत घृणा करती है न मंजू?"

तब न जाने क्यों मंजरी का हृदय ममता से भर जाता। हर रात वह निश्चय कर लेती कि सुबह होते ही यहां से चली जाएगी, यहां के गंदे, कुत्सित माहौल को छोड़कर, घृणा से मुंह फेर लेगी, बात नहीं करेगी लेकिन सुबह वनलता के उस चेहरे को देखकर सब कुछ गड़बड़ हो जाता। मानव मन का चिरंतन रहस्य यही है।

बात बंद करना संभव न होता।

आज भी वही तर्क-पर्व चल रहा था।

चले जाने का स्थिर संकल्प किए मंजरी कठोर हुई बैठी थी। चाय तक नहीं पी थी उसने। मालती ने जाकर वनलता से ज्यों-ही बताया वह अपने कमरे से इस कमरे में आ पहुंची।

एक सर्वांग प्रदर्शित करता छोटा सा ब्लाउज, बड़ी कठिनाई से गिरते-गिरते बची, शरीर से लिपटी जार्जेट की साड़ी पैरों में मखमल की चप्पल... किसी तरह से घिसटती हुई वनलता आई।

सामने वाले सोफे पर गिरते हुए अस्पष्ट स्वरों में बोली, "क्यों मुझसे घृणा कर जलग्रहण तक न करेगी?"

सख्त पड़ी देह और अधिक सख्त हो गयी-मंजरी ने मुंह फेर लिया। वनलता उसी तरह से अधलेटी हालत में बोली, "मुझ पर गुस्सा होकर क्या करेगी मंजू? मैं तो खराब हूं ही। मैं शराब पीती हूं मैं मर्दों को लाती हूं रात में साथ देने के लिए, यह तो तुझे पता है न? फिर?"

और भी कठोर हो उठी मंजरी। तीव्र स्वरों में बोल उठी, "जानती हूं। और जान-बूझकर निश्चित आश्रय की आशा से यहां पड़ी हुई हूं सोचकर अपने आपसे घृणा हो रही है मुझे। मैं चली जा रही हूं।"

पल भर मंजरी के उसे क्रोधारक्त और वितृष्णा से कुंचित चेहरे को देखने के बाद वनलता ने एक सांस छोड़ी, "जा फिर। अब मैं तुझे नहीं रोकूंगी। हां, चली ही जा। मेरे संसर्ग में मत रह-मैं बड़ी खराब हूं। नाली के कीड़े की तरह बुरी हूं मैं।"

मंजरी इस स्वीकारोक्ति से विचलित हुई।

विचलित होने पर भी क्रुद्ध स्वरों में बोली, "अपने को ऐसा सोचते हुये तुम्हें शर्म नहीं आती है?''

"शर्म? हाय-हाय! तूने तो हंसा दिया मंजू! हम भला क्या शर्माएंगे?" गुस्सा उतर गया। मंजरी हताश भाव से बोली, "लेकिन लता दी अपने को तुम जितनी बुरा कहती हो, उतनी बुरी तो हो नहीं।"

"क्या कहा? एं? उतनी खराब नहीं हूं? हा-हा-हा! तू क्या हंसा-हंसाकर मुझे मार डालना चाहती है? मैं कितनी बुरी हूं बुरी हो सकती हूं-यह शरीफ घराने की तेरी जैसी बहुएं सोच ही नहीं सकती हैं मंजू! सुनेगी तो रोंगटे खड़े हो जायेंगे।"

मंजरी दृढ़ स्वरों में बोली, "मैं किसी और की बात नहीं जानती हूं लेकिन तुम्हारे लिए कह सकती हूं तुम सचमुच बुरी नहीं हो। तुम जान-बूझकर बुरी बनती हो। लापरवाही और गंदगी दिखाने का तुम्हें शौक है। यूं तुम्हें देखकर सोचा नहीं जा सकता है, विश्वास नहीं होता है कि तुम... लेकिन तुम्हारे अभद्र व्यवहार देखकर शर्म और घृणा से मेरा ही जी करता है कि मर जाऊं।"

"एं, क्या कह रही है? मेरे शर्म से मेरा मरने को जी चाहता है?" कहते हुए नशे से चूर वनलता ने एक अद्भुत कार्य किया।

दोनों हाथ से सीना पकड़कर फूट-फूटकर रोने लग गयी।

दौड़ी आई मालती।

भागा आया देवनारायण। हाथ के इशारे से उसे हटाते हुए मालती ने पूछा,  "क्या हुआ है नई दीदीजी? दीदी अचानक ऐसे क्यों कर रही हैं?''

मंजरी ने सिर हिलाते हुए कहा, "पता नहीं।"

"अरे! जानती कैसे नहीं हो? सामने बैठी हो... ''

अब वनलता ने रोते-रोते कहा, "अरे मुझसे जो इतनी खुशी बर्दाश्त नहीं हो रही है... मेरा दिल फटा जा रहा है।"

"खुशी किस बात की? रात को तो जरा भी होश नहीं था। कहते हुए मालती ने ऊंची आवाज में पुकारा, "देवा, एक गिलास पानी तो ले आ जल्दी।" पानी आते ही थोड़ा सा पानी चुल्लू में लेकर वनलता के मुंह और आंख पर छींटा मारा, वनलता को खींचकर उठाया फिर उसके मुंह के आगे गिलास पकड़कर बोली, "लो पी लो।"

वनलता ने एक ही सांस में पी लिया पानी फिर बोली, "ओ मंजू मेरा फिर से जीने का जी कर रहा है।"

"जीना 'ही होगा तुम्हें।'' दृढ़ स्वरों में बोली मंजरी।

"मालती तू जा।"

वनलता जार्जेट की साड़ी की आचल से आंख मुंह पोंछते हुए बोली, "वह सोच रही है शराब का असर है। लेकिन नहीं रे मंजू अचानक खुशी के कारण मैं रो पड़ी थी।"

"तुम चाहो तो अभी भी संभल सकती हो लता दी।"

वनलता ने गंभीर भाव से सिर हिलाया।

"आज इस बात का उत्तर नहीं दूंगी... दो साल बाद, दो साल बाद इस बात का उत्तर तुझे अपने आप ही मिल जाएगा।"

मंजरी सिहर उठी।

स्पश्ट प्रत्यक्ष था वह सिहरना।

"क्यों, डर गयी?'' वनलता ने अनुकंपा भरी हंसी हंसकर कहा।

"शुरू शुरू में मैं भी ऐसे ही सिहर उठती थी।"

मंजरी और भी दृढ़तापूर्वक बोली, "इस बात पर मैं विश्वास नहीं करती हूं। अपने आपमें शक्ति हो तो ठीक रहा जा सकता है। खुद कमजोर नहीं होगे तो किसमें हिम्मत है कि तुम्हें बिगड़े अभिनय एक कला है, प्रोफेशन के तौर पर ग्रहण करके बर्बाद होना पड़ेगा यह किसने कहा है? मैं तो सोच ही नहीं सकती हूं... क्यों... ''

बात पूरी होने से पहले ही वनलता खिलखिलाकर हंसने लगी, "मैं भी पहले इस तरह की बहुत सी बातें नहीं सोच सकती थी। ये ही तू-तूने क्या एक साल पहले सोचा था पति घर गृहस्थी छोड़, मान सम्मान को आग लगाकर एक थियेटर करने वाली औरत के घर में पड़ी रहेगी? घटनाचक्र समझी, सभी घटनाचक्र है।''

न:, अपनी नजरों में अपना स्वरूप दिखाई नहीं पड़ता है इसीलिए इंसान बिना सोचे विचारे कुछ कह बैठता है, नासमझ जैसी बात करता है। सिर्फ जब दूसरों के दृष्टिदर्पण में अपने को देखा तब स्तब्ध हो जाओ, स्वस्तंभित हो जाओ।

जैसे आज स्तब्ध रह गयी मंजरी।

पहले दिन का वह अंतर्दाह, दैनिक कर्म प्रभाव का प्रलेप पाकर कब बुझ सा गया था, इस अद्मुत जीवन का अभ्यस्त हो गया था, इसीलिए यह बात इतनी स्पष्ट तरह से दिखाई नहीं पड़ी थी।

ठीक यही समय था जब अभिमन्यु स्तब्ध बैठा था। घर में नहीं, बारामदे में नहीं, पार्क के बेंच में नहीं, कलकत्ते में कहीं नहीं। बैठा था हरिद्वार के एक निर्जन स्थान में। यहां से गंगा-दर्शन नहीं होता है। ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी जगह, और थोड़ा ऊपर जाने पर एक अवहेलित मंदिर है। वहां तक पहुंचने की एक लुप्त प्राय: सीढ़ी भी है, यह उसी के पास बना चबूतरा है।

यहां कदाचित ही कोई यात्री आता है। कभी-कभी कोई उदार चित्त यात्री, स्नान करके रास्ते में जहां जितने विग्रह मूर्तियां देखते पानी छींटते-छींटते चलते हैं, उन्हीं में से कभी कोई इस तृर्षाक्त मूर्ति पर भी दो चार बूंद पानी छींट जाता है। बाकी वक्त निस्तब्ध निर्जन।

नीचे थोड़ी ही दूर पर हरकी पैड़ी का घाट-कितना शोर मचा था वहां, कितने लोग। कौन कह सकता है कि उसी घाट के इतने पास ऐसा जन मानवहीन एक अद्भुत जगह है। बैठे-बैठे इंसान यह भी भूल जाता है कि वह है कहां? मानो पृथ्वी से अलग एक अनैसर्गिक स्तब्धता विराज रही हो।

जबकि कुछ मिनट का रास्ता, नीचे उतरते ही शहरी जीवन की प्राचुर्यता मिलेगी। तांगे वालों का चिल्लाना, असंख्य रिक्शे, उनकी घंटियों की टनटनाहट, अनगिनत दुकानें और उनके सामने खड़े लोग, खरीददार, अकथनीय भिखारियों की भीड़ और अनगिनत पुण्यार्थियों द्वारा पढ़ा जाने वाला स्तोत्र पाठ।

कुल मिलाकर दिशाहीन उद्भ्रांति।

उन्हीं लोगों के बीच हैं पूर्णिमा। अभिमन्यु आया है इस निर्जन पर्वत पर।

यही तीर्थ है।

इसीलिए तीर्थ का महात्म्य है।

इसी अपूर्व आश्रय की खोज में थका, काम से पिसता इंसान कभी-कभी मुक्ति पाने की आशा से तीर्थस्थलों में आता है। भागे-भागे आते है आनंद पाने की खोज में कुछ उत्साही, आते हैं गृहस्थ, परलोक लोभी पुण्यार्थी और आते हैं उदासीन वैरागी।

अपने आपको खोना चाहते हो तो तीर्थ स्थलों में जाओ।

अपने को खोजना हो तो तीर्थ स्थल में जाओ।

कौन जाने अभिमन्यु यहां क्यों आया है।

अपने आपको खोने या अपने को ढूंढ़ने?

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