Manjari - Hindi book by - Ashapurna Devi - मंजरी - आशापूर्णा देवी
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मंजरी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15409
आईएसबीएन :0000000000

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आशापूर्णा देवी का मर्मस्पर्शी उपन्यास....

19

गुनगुनाते हुए अलसाई दृष्टि से वनलता ने कमरे पर नजर दौड़ाई। कितना अच्छा लगता अगर वह इसी तरह से घंटों पड़ी रह सकती। लेकिन घंटा तो दूर मिनट भर वह पड़ी नहीं रह सकती है। अभी उठना होगा। आज थियेटर का दिन है। पहले सिर्फ मंचों पर काम करती थी। तब खाली समय मिल जाता था। गगन घोष ने उसे फिल्मों में काम दिया। और अब फिल्मी जगत उसे हर फिल्म में देखना चाहता है। इधर तीन चार फिल्मों में उसने साइन भी कर डाला है।

यश, अर्थ, अनुरोध, अपरध।

ये सारी चीजें उसे घोड़े की तरह भगा ले जाना चाहती हैं। रुकने ही नहीं देना चाहती है। शायद तभी छोड़ेंगे जब पुरानी हो जायेगी वनलता, बूढ़ी हो जायेगी। तब जगह पर कब्जा करने आयेंगी नई-नई लड़कियां। वनलता को मालूम है तब थककर चूर-चूर हुई वनलता के बीच रास्ते में छोड़कर चले जायेंगे यही यश अर्थ अनुरोध उपरोध। पलटकर तब कोई देखेगा तक नहीं। अतएव जितना हो सके अभी लूट लो, जितना चाहे अंहकार कर लो।

फिर भी आज जरा भी उठने की इच्छा नहीं हो रही थी। पर उठना तो पड़ेगा ही। स्टूडियो के काम में एक बार तबीयत खराब का बहाना किया भी जा सकता है पर थियेटर तो जाना ही पड़ेगा। अभी जाकर घुसना पड़ेगा 'रंगनाट्य' के उस सड़े से ग्रीनरूम में। यह साज श्रृंगार त्यागकर सिर पर झोंटा बांध, नाक पर तिलक लगाकर वैष्णवी संन्यासिनी बनकर हजारों हजारों दर्शकों के सामने जाना पड़ेगा। गाना पड़ेगा 'आमी बंधूर लागिया सेज बिछाइनू... ''

इससे छुटकारा नहीं मिलने वाला वनलता को।

क्रिंग-क्रिंग-क्रिंग।

उठने वाली ही थी कि फोन बजा।

"ओहो।"

गाना बंद कर मुंह बिगाड़कर वनलता बड़बड़ाई, "न जाने अब किस बंधू का फोन आया।"

वह न उठी, न हिली। केवल क्रुद्धदृष्टि से उस मूक यंत्र को देखती रही।

क्रिंग-क्रिंग-क्रिंग-क्रिंग। टेलीफोन।

दौड़ी आई मालती, रिसीवर उठाकर झटपट 'हैलो' 'हैलो' करके जब यह जान गयी कि कौन बोल रहा है तब मुंह घुमाकर बोली, "गगन घोष।'

"ओफ! शैतान मरता भी नहीं है।"

कहकर वनलता ने उठकर फोन का रिसीवर लेते हुए महीन आवाज में बोली, "हां मैं वनलता बोल रही हूं "कहिए। एं! क्या कहा? मंजरी? वही नई लड़की? क्या कह रहे हैं? सर्वनाश! मेरे यहां? मेरे यहां कहां रहेगी? असंभव! क्या कहते हैं? सिर्फ दो वक्त के लिए? उसके बाद? क्या? आप इंतजाम कर देंगे? अभी वह इंतजाम कर दीजिए न। मुझे क्यों परेशानी में डाल रहे हैं? मुश्किल नहीं तो और क्या कहूं? मैं तो निकल रही हूं। हां, हां। आज थियेटर है। घर पर? घर पर मेरी नौकरानी रहती है। ओ हां, नौकर चौकीदार भी है। ठीक है, कहकर जाती हूं। लेकिन सुनिए, बुरा मत मानिएगा-सिर्फ दो ही वक्त के लिए... समझ तो रहे ही होंगे कितनी अस्वस्ति हो रही है मुझे। ओ, हा:-हा:-हा:। आपका भी कम झमेला नहीं। कहां कौन पति-पत्नी झगड़ेंगे और उसका झमेला आप संभालें। हि-हि-हि-हि... आप ठीक कह रहे हैं। अच्छा, ठीक है। लाइए उसे। लेकिन बीस मिनट में... वरना मुझसे भेंट नहीं होगी। हां-अच्छा, रखती हूं।"

रिसीवर धड़ से रखकर वनलता फिर बिस्तर पर बैठ गयी। बोली, "ओह, कैसा झमेला है।"

अब तक मालती आंखें निकाले वनलता की बातें सुन रही थी ओर उसने पूछा, "क्या बात है दीदी?"

"पूछ मत? अभागा गगन घोष फालतू की एक मांग कर रहा है?''

"कैसी मांग।"

"कहता है एक नई लौंडिया अपने पति के साथ झगड़कर जिद करके निकल आई है, उसे मेरे फ्लैट में रहने देना पड़ेगा।"

"अरे बाप रे... ये कैसी बात है दीदी?''

"यही बात है। ले अब आरती उतारने के लिए थाली सजाकर दरवाजे के सामने खड़ी हो जा। आती ही होगी।"

मालती तरह-तरह से बातें करके, सवाल पूछ-पूछकर मंजरी के बारे में सारी बातें जान लेना चाहती थी। वनलता भी कुढ़ते हुए संक्षेप में उत्तर देती रही और अंत में 'चुप हो जा मालती जान न खा' बोली तभी देवनारायण दरवाजे के सामने आकर खड़ा हुआ।

गगन घोष किसी को लेकर आये हैं। उन्हें बैठक में बैठा दिया है।

केश-वेष ठीकठाक करके वनलता धीर मंथर गति से बैठक में गयी।

"ये... ले आया हूं इन्हें। एक आध दिनों में कोई एक व्यवस्था जरूर कर सकूंगा। वही दो दिन तुम अपने यहां... ''

इस समय वनलता की मूर्ति बिल्कुल भित्र है।

परम आत्मीय भाव से स्तब्ध बैठी मंजरी के पीठ पर हाथ रखकर वनलता उदारता से बोली, "ठीक है। छोटी बहन दीदी के यहां आकर दो चार दिन रहेगी तो इसमें ऐसे कौन सी बात है? लेकिन बहन तुम्हारी दीदी तो अभी दासता करने चली। मेरी नौकर चाकर हैं, नौकरानी मालती है, खूब काम की है, जो जरूरत हो कहकर करवा लेना-समझ गईं न?"

गगन घोष गद्गद होकर बोले, "मैं जानता था। जानता था तभी तो इन्हें भरोसा दिला सका था। अच्छा मिसेज लाहिड़ी तब फिर मैं चलता हूं।"

घोष के जाते ही वनलता चंचला भाव से बोली, "मैं भी चलती हूं भाई। बुरा मत मानना... मालती... ''

कहना न होगा, मालती दरवाजे के दूसरे तरफ ही थी। वनलता व्यस्त भाव से बोली, "ये रही। सुनो नई दीदी जी की देखभाल करना। क्या-क्या चाहिए ठीक से पूछ लो, समझी न? याद रखना मेरी तरह ही ध्यान रखना होगा।... चलूं बहन। उठो, तुम भी अपने घर की तरह... ''

बार-बार हार्न सुनकर व्यस्त वनलता चप्पल उतारकर किसी तरह से जूता पहनते हुए नीचे उतर गयी। और पहले जैसी ही स्तब्ध बैठी रही मंजरी। शराफत के बदले कुछ कहना चाहिए था, यह भी उसे याद न रहा।

मालती के बार-बार पूछने पर थककर मंजरी ने कहा, "मुझे कुछ नहीं चाहिए। उन्हें लौटने दो पहले।"

"उन्हें" अर्थात् वनलता।

मालती ने सोचा था खूब दोस्ती बढ़ाकर पति-पत्नी के झगड़े का रहस्य जान लेगी-लेकिन सुविधा नहीं हुई। होंठ उल्टकर कहती चली गयी, "तब फिर मैं क्या कह सकती हूं। दीदी अगर आकर मुझे डांटे तब देखिएगा।"

उसके जाने के बाद मंजरी ने अवाक् होकर चारों तरफ देखा। देखकर बहुत अवाक् हुई।

मंजरी रहने आई है यहां।

मंजरी।

प्रोफेसर लाहिड़ी की पत्नी मंजरी लाहिड़ी। सारे कलकत्ते में आत्मीय रिश्तेदार फैले हुए हैं-जो शिक्षित हैं, सभ्य हैं मार्जित रुचि वाले और धनी हैं, अभिजात हैं। वही मंजरी रात को रहने आई एक थियेटर की अभिनेत्री के घर? सिर्फ रहना नहीं, उसकी कृपा के मोहताज होकर रहना।

आग से झुलसे हिस्से की जलन सी महसूसकर रही थी पीठ की उस जगह को, जहां वनलता ने अपने रंगे हुए लंबे नाखूनों वाले हाथ से छूआ था। अनुकंपा की उस दाह से सर्वांग जल रहा था।

दाह सब जगह था।

देह में, मन में, हर अणु-परमाणु में।

सहकारी नलिनी बाबू मुंह तिरछा करके बोले, "घर से निकल आएगी, यह मैं जानता था। श्याम और वंश-दोनों क्या एक साथ संभाला जा सकता है? इस लाइन में जो भी आया है, उसे फिर 'स्वामी' के साथ रहना नहीं पड़ा है। अनेकों को तो देखा है। शुरू में तो ऐसा जताएगी जैसे क्वीन विक्टोरिया है बाद में शराब पीकर नाचती हैं।"

प्रयोजक परिचालक मुस्कराकर बोले, "चलो यह अच्छा हुआ। दो जगह मन अटका रहे तो काम में दिल नहीं लगता है।"

"न जाने उसमें आपने क्या देख लिया है।'

"देखा है भाई देखा है। इस लड़की में एक्टिंग के गुण हैं।"

इसके बाद अगले फिल्म के बारे में बातें होती रहीं।

इसी के साथ-साथ नए सिरे से अनुबंध-पत्र तैयार किया जाने लगा जिससे कि मंजरी को दूसरा कोई न तुड़ा ले जाए।

इंसान का मन, एक आश्चर्यजनक चीज है। इसे स्वयं पता नहीं रहता है कि कब किधर बहेगा। जो इंसान दो दिन पहले, दो दिन रखने के प्रस्ताव पर नाराज हुआ था, उसे ही अब हमेशा-हमेशा के लिए रखने को वनलता उतावली हो जायेगी, क्या वह जानती थी?

अरि मंजरी?

वह भी अवाक् आश्चर्य से देख रही थी कि कैसे अद्भुत बंधन में बंधती जा रही है। जिससे घृणा करती है, अश्रद्धा करती है, उसके प्यार का बंधन भी क्या वैसा ही अभेद है?

शुरू-शुरू में गगन घोष दो चार सस्ते फ्लैटों का पता ले आए थे लेकिन हर बार वनलता नाक सिकोड़कर कहतीं, "पागल हुए हैं? वहां भला कहीं आदमी रहते हैं? उस जगह को अस्ताना न कहकर अस्तबल कहना ज्यादा ठीक होगा।"

गगन घोष अगर इशारे से मंजरी की आर्थिक असंगति की बात करते तो वनलता बार-बार सुना देती, "पैसा कम है तो आप पैसा दीजिए। जिसकी कैपेसिटी बेचकर लाख-लाख रुपया कमायेंगे, उसे उसके उपयुक्त देंगे क्यों नहीं, बताइए? दो दिन बाद इसका बाजार भाव तो देखिएगा।"

फोन के उधर से घोष महाशय विनीत स्वीकृति जताते, "अरे, यह बात क्या मैं मानता नहीं हूं? अपने सामर्थ्य भर तो दूंगा जरूर। जरूर दूंगा... ''

सुनते ही मुखरा वनलता कह बैठी, "आप लोग तो हर समय वैष्णवों जैसा विनय प्रदर्शन करते हैं। समुद्र को कहते हैं गोष्पद। खैर छोड़िए, अपने सामर्थ्य का हिसाब न लगाकर उसके सामर्थ्य का लगाइए न? जब मोटी रकम दिखाकर बंबई वाले छीनकर ले जाएंगे तब हाथ मलते रह जायेंगे।"

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