मंजरी - आशापूर्णा देवी Manjari - Hindi book by - Ashapurna Devi
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मंजरी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :167
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15409
आईएसबीएन :0000000000

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आशापूर्णा देवी का मर्मस्पर्शी उपन्यास....

16

हर एक का दृष्टिकोण भिन्न है, विचारधारा भिन्न है। जब जिधर चिंता की रोशनी पड़ती है वही जगह सच की तरह उद्भाषित हो उठता है लेकिन वास्तविक सत्य क्या आज तक तय हुआ है? आज भी क्या इंसान समझ सका है कि सचमुच के कल्याण का रूप क्या है?

सुनीति बोलीं, ''तब फिर यही तय रहा, क्यों जी? यहां से पहले मंजू एक बार अपने घर जायेगी। एक कपड़े में बेहोशी की हालत में यहां चली आई थी, यहां से सीधे ले जाने पर असुविधा होगी इसे। घर जाकर कपड़े वगैरह लेकर हमारे यहां चली आयेगी। उसके बाद जब पूरी तरह से स्वस्थ नहीं होगी हमारे पास ही रहेगी। यही तय हो गया अब इसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा।''

सरल चित्त सुनीति हाथ से हाथी धकेलना चाहती है, चाहती है फूंक से पहाड़ उड़ाना। सहज बातों और सहज हावभाव से चाहती है सब बातों का समाधान हो जाए।

मंजरी उसके बचपने से हंसी।

विजयभूषण बोले, ''तुमने तो एक तरफा राय दे डाली। साली की राय ले ली है क्या? इसके तो बड़े-बड़े कंडीशन हैं। तुम्हारी सौत बनाकर उसे मेरे पास भेजने को तैयार रही तो वह तुम्हारे घर में अपने चरण रखेगी, नहीं तो नहीं।''

''इसके लिए मैं तैयार नहीं हूं क्या? तीन दिन अगर तुम्हारे नखरे सह सकी तो मान जाऊंगी।''

मंजरी हंसकर बोली, ''जितना बहाना बना सकती हो बना लो। जीजाजी तो ऐसे निर्झंझट वाले इंसान हैं। दुनिया में और कोई होगा भला?''

''देख लो... सुनीतिवाला... गुणग्राही किसे कहते हैं देख लो।''

''तो आज चलते हैं मंजू। फिर कल आऊंगी। अरे आज तो अभिमन्यु नहीं आया। शाम हो गयी।''

विजयभूषण गंभीर होकर बोले, ''इसके पीछे कलह संबंधी किसी बात का हाथ लग रहा है।''

''आप बेकार वाली बात सोच रहे हैं, ऐसा कुछ नहीं हुआ है।''

''अगर कलह नहीं तो मामला और भी ज्यादा संगीन बना लिया है तुमने मंजरीदेवी। तुमने तो मुझे चिंता में डाल दिया।''

''आप लोगों को चिंता में डालना ही तो मेरा काम है। डर रहता है कहीं भूला न दें।''

विजयभूषण मंजरी के पास जाकर उसके सिर पर प्यार से एक हल्की चपत जमाते हैं। फिर स्नेहभरी आवाज में बोले, ''कमजोर दिमाग से कुछ बेकार की बातें सोच-सोचकर अपनी तबीयत मत खराब कर लेना बहन। इंसान का इंसान के हृदय का सहज संबंध जटिल हो जाता है अकारण के संदेह से। दूसरों की नजरों से अपने आपको देखना सीखो, दूसरे की जगह पर खड़े होकर अपने को परखो। जहां किसी के प्रति अभिमान से अंधी हुईं, वहीं उसकी जगह पर अपने को खड़ा करो। सोचो तुम उसकी जगह पर होतीं तो क्या करतीं। मान और अभिमान अपमान शब्दों के रचयिता इंसान खुद है। देश, समाज और व्यक्ति-जहां जैसे हैं वहीं इसका रूप भी अलग-अलग है। तब फिर ऐसे कमजोर शब्दों के कारण जीवन की जटिलता को क्यों बढ़ाओ? कोई किसी का सम्मान छीन सकता है? किसी का क्या कोई अपमान कर सकता है? तुम्हारा सम्मान तुम्हारे पास है जिसे कहते हैं आत्म-सम्मान।''

सहसा मंजरी की दोनों आंखें भर आईं। बोली, ''उसी को बचाने के लिए तो भाग आना चाहती हूं जीजाजी। प्रतिष्ठा के पीछे के खोखलेपन का भेद जो खुल गया है।''

विजयभूषण कुछ कहने जा रहे थे कि सुनीति की हर्ष मिश्रित हंसी के कारण चुप हो गए।

सुनीति किसी को उद्देश्य कर कह रही थीं, ''ये रहे। इतनी देर में हजरत का आना हुआ। हम लोग कब से आकर बैठे थे-अब जा रहे हैं। इतनी देर क्यों हो गयी? ठीक हो न ?''

देखा विजयभूषण ने। देखा मंजरी ने।

अभिमन्यु ने कमरे में प्रवेश किया।

एक हाथ में संदेश का डिब्बा और दूसरे हाथ के लिफाफे में संतरा और सेव।

''न:! अभी तक हास्पिटल से रिमूव नहीं किया है। ओफ! कैसा झमेला है जरा बताइए तो। मैंने तो कहा ही था ऐसी नई-फई से काम नहीं चलने वाला... '' सहकारी नलिनी बाबू ने मुंह बिगाड़कर कहा, ''अब मुसीबत संभालिये।

प्रयोजक गगन घोष सिगरेट की राख झाड़ते-झाड़ते स्थिर स्वरों में बोले, ''सभी कुछ एक्सीडेंटल है। नई है तभी बीमार पड़ी है, पुरानी होती तो नहीं पड़ती ऐसा तो कह नहीं सकते हो।''

''चलिए मान लेते हैं लेकिन आज दो हफ्ते से काम बंद पड़ा है... ''  

''नुकसान तो हो ही रहा है लेकिन क्या करें? अब तो उसे निकालकर नए सिरे से कुछ करना संभव नहीं।''

''इधर वनलता ने नखरा शुरू कर दिया है। कह रही है अगले महीने चेंज में जायेगी।''

''अच्छा? यह बात कब कही?''

''आज ही फोन करके पूछ रही थी कि शूटिंग कब शुरू होगी। मुझसे ये सुनकर कि 'अभी भी कोई उम्मीद नहीं है,' बोली तब आप लोग समुद्र में गोते खाइए मैं अगले महीने चेंज के लिए जा रही हूं।''

''कहां जा रही है?''

''कौन जाने। मुंगेर या ऐसा ही कुछ कह रही थी।''

''जाएगी कहीं नहीं। ये सब है भाव बढाना। जाओ जाकर कुछ तेल वेल लगाओ। नया चेहरा क्या यूं ही लिया है? इन लड़कियों की चालबाजी देख-देखकर लगता है कि गांव से 'रॉ' लड़कियां पकड़ लाऊं और काम कराऊं। इसके अलावा-ये मंजू या जो भी है इसमें अभिनय क्षमता है। एक हफ्ता इंतजारी करके देखता हूं।''

''देंगे नहीं-''नलिनी बाबू ने फिर मुंह बनाया, ''इतनी जल्दी घर से आने नहीं देंगे। मुसीबत में पड़कर पैसे कमाने तो निकली नहीं है-निकली है शौक के कारण। सुना है पति प्रोफेसर हैं। पति के भाई लोग भी बड़े पैसे वाले हैं। घरवालों ने आपत्ति की थी लेकिन आधुनिका है किसी की बात सुनी नहीं।''  

''इतनी बातें तुमने कहां से जुटाईं?''

''बातें? बातें तो हवा के साथ चलती हैं।''

''खैर छोड़ो। तुम वनलता की खुशामद करके उसे ठीक रखो। कह देना फिल्म पूरी किए वगैर कहीं जाएगी नहीं।''

''अगली फिल्म में दया करके उसे अब मत लीजिएगा।''

''किसे? नई को?''

''नहीं-वनलता की बात कर रहा हूं। बहुत दिमाग है। मुंह दबाकर हंसे वगैर बात नहीं करती है। बात बात पर घमंड झलकता है।''

''अभी उसके दिन हैं ऐसा तो करेगी ही।'' गगन घोष एक और सिगरेट सुलगाते हुए क्षुब्ध हंसी हंसे, ''क्या-क्या नहीं देखा? सूई बनकर घुसती हैं और कुल्हाड़ी बनकर निकलती हैं।''

''और आप जीवन भर गधे पीट-पीटकर घोड़े बनाइए।''

गगन घोष हंसने लगे।

नलिनी बाबू गुस्सा होते हैं तो उन्हें मजा आता है।

मंजरी ने इन्हें परेशानी में डाल दिया है लेकिन नाराज होकर निकाला नहीं जा सकता है। ये कोई स्टेज पर खेला जाने वाला थियेटर नहीं कि एक की अनुपस्थिति से दूसरे से काम चला लिया गया। काफी धन लगाकर काफी सीन बन चुके हैं।... मुसीबत वनलता के कारण भी है। वह बड़ी घमंडी है। असल में वह है मंचाभिनेत्री। गगन घोष ने ही उसे एक के बाद दूसरी, दो फिल्मों में काम दिया है। लेकिन ढेर सारे रुपये लेने के बाद भी ऐसे हावभाव दिखाती है जैसे गगन घोष को पितृदाय से उद्धार कर रही है।

''निशीथ तो ठीक है न? या वह विलायत जाना चाहते हैं।''

''अभी तो नहीं चाहा है लेकिन कभी भी चाह सकते हैं।''

इसके बाद भी इधर-उधर की बातें होती रहीं। बाद में नलिनी बाबू मोटर लेकर वनलता की खुशामद करने और मंजरी का हालचाल लेने निकल लिए। वह कब तक काम शुरू कर सकेगी पता चल जाए तो कुछ काम पहले से करके रखा जा सकता है।

कार पर बैठकर नलिनी बाबू बड़बड़ाये, ''अब झक मारो। साले का 'सहकारी' बनकर ही जीवन कट गया, आज तक स्वाधीन होकर एक फिल्म बनाने का चांस नहीं मिला। इन नालायक लड़कियों को तेल लगाते जिंदगी बीती जा रही है।''

''क्षतिपूर्ति?'' नलिनी बाबू ने अवज्ञापूर्ण हंसी हंसकर कहा, ''क्षतिपूर्ति के तौर पर आप कितना रुपया दे सकते हैं मिस्टर... मिस्टर... ''

''लाहिड़ी।'' अभिमन्यु बोला।

''ओ ईयश। मिस्टर लाहिड़ी। तो मैं पूछता हूं कि अभी तक इस फिल्म पर कितना खर्च हो चुका है आपको कुछ आइडिया है?''

''ठीक से पता न होने पर अंदाज तो लगाया ही है।'' अभिमन्यु का चेहरा लाल पड़ गया।

नलिनी बाबू ने एक आंख सिकोड़कर खुले गले से कहा, ''बोलिए। बोल डालिए अपना अंदाज।''

अपमान की कालिख मुंह में पोतकर अभिमन्यु बोला, ''मैं वकील के आगे ही बताऊंगा।''

''ठीक है-वही कहिएगा। लेकिन अगर मेरी सलाह मानें तो मिस्टर लाहिड़ी मैं कहूंगा, जान-बूझकर झंझट बुला लाना उचित नहीं। हालांकि मुझे कहना नहीं चाहिए, आपकी आर्थिक हालत से आप खुद वाकिफ हैं फिर भी बिला वजह चालीस पचास हजार रुपया... इसके इलावा फजीहत भी बहुत है।'

अभिमन्यु ने भौंहें सिकोड़कर कहा, "चालीस पचास? सुना है फिल्म अभी आधी ही बनी है।"

"आधी नहीं, वन थर्ड। खर्च का पूरा हिसाब कोर्ट में दाखिल किया जायेगा। लेकिन सोचकर देखिए मिस्टर लाहिड़ी, मिसेज लाहिड़ी के बीमार पड़ने पर आपने इतना खर्च किया लेकिन क्या उन्हें आराम करने का मौका दे सकेंगे? कोर्ट में हाजिरी देने में भी तो कष्ट होगा... ''

कुढ़कर अभिमन्यु बोला, "वह मैं समझूंगा।"

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