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चश्में बदल जाते हैं

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :103
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15408
आईएसबीएन :0000000000

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बाप बेटा को समझाना चाहता है कि युग बदल गया है-तुम्हारा चश्मा बदलना जरूरी है। वृद्ध पिता के चेहरे पर हँसी बिखर जाती है।

39

दोनों भाइयों ने एक दूसरे को देखा। आपस में आँखें मिलीं दोनों देवरानी जिठानी की। और एक दूसरे को देखा जो जोड़ी दम्पत्ति ने। और उसी वक्त सोमप्रकाश के बूढ़े मार्का दामाद अपनी पत्नी से कर्कश स्वरों में बोल उठे-'ओ:! शास्त्र! कानून। लग रहा है सभी कुछ जानकर बैठी हो। वह सब पुराने ज़माने की बातें है, भूल जाओ तो। माँ सभी की थीं-लड़कों की भी, लड़की की भी। तब एक को ही सारा फायदा क्यों हो?'

सुनेत्रा तो अवाक रह गई। उसका हमेशा का कंजूस, अर्थलोभी पति में यह कैसा रूपान्तर? सुन्दरी सलहजों के सामने 'हीरो' बनना चाहता है? इसीलिए उसने भी खनक कर कहा-'और तुमको सब पता है? जाओ जाकर पाँच जने से पूछो।'

'ये साला किसी को पूछने की ज़रूरत नहीं समझता है सुनेत्रा। हो सकता है कभी रहा होगा यह नियम। और वह भी तब जब लड़कियों को पिता की सम्पत्ति में हिस्सा नहीं मिलता था। अब इस ऊपरी सुख की ललक क्यों? पेड़ का भी खाओगी और ज़मीन का भी बटोरोगी? वाह! लेकिन वह अब तक भीतर के कमरे में क्या कर रहे हैं यह तो कोई बताओ? जाओ न, एक बार जाकर देख तो आओ।'

जाकर देख आए? सुनकर सुनेत्रा का खून बर्फ सा जम गया। बाप रे! अगर जाकर देखे ...अरे आप रे, अगर जाकर देखे कि पिताजी खाट पर स्थिर हो कर पड़े हुए हैं-पत्थर की तरह?

सूखे कण्ठ स्वर से बोली-'देखूँगी क्या? शायद रेस्ट कर रहे हों?'

सुनेत्रा ने ही पहले सोचा था 'कुछ हो तो नहीं गया है?'

अमल ने दीदी के चेहरे की तरफ देखकर आवाज़ पर कंट्रोल रखते हुए कहा-'यही सम्भव है। इधर कुछ दिनों से उनके मन...'

बड़े बेटे ने डूबती आवाज़ में कहा-'ये है कि... इस वक्त पिताजी नहाते हैं न? शायद नहाने चले गए हैं।'

सुनेत्रा बोली-'हट! अभी... बारह बजे दिन को? कब का नहा चुके हैं। अभी तक अवनी तो है... वह क्या वक्त का इधर-उधर होना बरदाश्त करेगा?'

'तो फिर-ये है कि... अचानक... यूँ ही बाथरूम में... मानें कई दिनों से 'अनियम' भी तो हो रहा है। अपनी तबियत के बारे में तो पिताजी कुछ कहते भी नहीं हैं।'

अभिमन्यु बोल उठे-'तो एक बार देख आने में हज्र क्या है? मैं नहीं जा रहा हूँ-मुझे ये है कि... कुछ 'लाइक' नहीं करते हैं।'

'आश्चर्य है। ऐसी अदभुत बातें करते हो तुम भी। तुम्हें 'लाइक' नहीं करते हैं यह बात कहीं किसने तुमसे?'

पत्नी की छिड़की सुनकर अभिमन्यु हँस देता है-'ये बात क्या कोई न बताए तो समझ में नहीं आती है? ठीक है-मैं ही जाकर देखता हूँ। चिन्ता हो रही है।'

और तभी छोटी सलहज बोल उठी-'चिन्ता करने वाली क्या बात है। आप लोग ऐसी एब्सर्ड बातें करते हैं। वह आ रहे हैं... '

सारी आँखें खास एक दरवाज़े पर जा टिकीं।

पर्दा हटा।

हाथ में कुछ कागज़ात लिए, पर्दा हटाकर सोमप्रकाश चले आ रहे थे। सामने धोती पाँव के पास लटपटा रही थी।

शान्त गम्भीर हँसी हँसकर बोले-'पिताजी को अचानक गायब हो जाते देख तुम लोग शायद सोच में पड़ गए थे। असल में तुम लोगों को एक चीज़ दिखाने के लिए लाने गया था पर मिल ही नहीं रही थी। अब जाकर मिली।'

उस 'मिल' गई चीज़ को सबकी आँखों के सामने बढ़ा दिया। उसी 'शेषाश्रय' ओल्डहोम के कागजात। नियमावली, प्रतिष्ठान की गुणावलीयुक्त पुस्तिका... व्यवस्थापत्र इत्यादि।

सोमप्रकाश ने क्यों ये सारे कागज़ उन लोगों के सामने बढ़ा दिया इसे कोई ठीक से समझ न सका। अतएव फुटकर मन्तव्य सुनाई पड़ने लगे।

'ओफ्फो! क्या लाजवाब बाथरूम है। मेरा ही जी कर रहा है वहाँ भर्ती हो जाऊँ।'

'ईश! क्या कामनरूम है? हमारे कॉम्प्लेक्स के किसी बीचों-बीच के तल्ले में ऐसा एक बड़ा सा रूम होता।'

'डाइनिंग हॉल तो देखने लायक है। मेज़ पर फूलदानी उसमें सजे फूल... '

'वो फूल शायद 'चिर अमर' हैं। सिल्क, सॉटन, वेलवेट के टुकड़ों और तार, सींक, थर्मोकोल वगैरह से बनते हैं। आजकल इन नकली फूलों की भयंकर डिमाण्ड है। खूब बन भी रहे हैं। ऐसे ही घरेलू ढंग से कितनी महिलाएँ ये बिजनेस कर रही हैं।'

सोमप्रकाश ने अवाक् होकर अपनी छोटी बहू को देखा। ये लोग कितना जानती हैं। फिर बोले-'ये जो वैसे ही नकली फूल है, चित्र देखकर पता चल रहा है? मुझे तो कोई... '

छोटी बहूमाँ ज़रा हँसकर बोलीं-'पकड़ में आ रहा है कामन सेन्स से। इन सब जगहों में हर रोज़ ताज़े फूल कौन लगायेगा? मेज़ों पर जो जगह-जगह फल रखे हैं? वह भी तो 'फॉल्स' हो सकते हैं। कृष्णनगर के कुम्हारा-पाड़ा के फल।'

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