चैत की दोपहर में - आशापूर्णा देवी Chait Ki Dopahar Mein - Hindi book by - Ashapurna Devi
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चैत की दोपहर में

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15407
आईएसबीएन :0000000000

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चैत की दोपहर में नारी की ईर्ष्या भावना, अधिकार लिप्सा तथा नैसर्गिक संवेदना का चित्रण है।...

20

अमियवल्लभ जरा हँसे। बोले, ''यह तो महज बच्चों जैसी बात है महारानी। तुम लोगों के सम्यक् ज्ञान को ग्रहण करने के लिए सबसे पहले देवादिदेव महादेव के पास जाना होगा। नशे का त्याग करना अब इस कलेवर में नहीं हो सकेगा, रानी साहिबा। शाम का आवेश एक स्वर्गलोक की सृष्टि कर देता है, उस हालत में नशे में चूर रहने पर कितना सुख मिलता है! यह तू कैसे समझेगी?''

अवंती ने कहा, ''हुँ! उस नशे में चूर रहने के स्वर्गीय सुख को आपके नाती साहब ने भी लपककर पकड़ लिया है।''

''अयं!'' अमियवल्लभ बोले, ''यह सिलसिला कब से चल रहा है''

''अन्दर-अन्दर चल रहा था, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में, मगर धीरे-धीरे उसका रूप विकराल हो गया।''

अमियवल्लभ ने कहा, ''नहीं-नहीं, यह अच्छी बात नहीं है। जरा विस्तार से सुनूँ। लदुवा घोड़े के मानिन्द खड़े रहने से काम नहीं चलेगा, बैठना होगा।''

तो भी अवंती खड़ी ही रही। सिर्फ कहा, ''कहिए।''

''इस तरह एक ही शब्द 'कहिए' कहने से काम नहीं चलेगा। वह साला इस बुरी लत का शिकार होने क्यों गया?''

''बिलकुल स्वाभाविक बात है।'' अवंती ने तुर्श लहजे में कहा, ''खून के गुण के कारण।''

''हूँ। औरतों का एक यही गुण है। दो बात सुनने का मौका मिलता है तो बाज नहीं आतीं। इस अभागे की पत्नी मर गयी थी, बिछोह के दर्द के कारण एक नशे को अपना लिया था।''

''टूटू मित्तिर की पत्नी भी मर गई है।'' अवंती ने तीखी आवाज में कहा।

अमियवल्लभ ने उदास स्वर में कहा, ''जरा साफ-साफ बताओ न, मामले को बहुत सीरियस बना डाला है क्या?''

''अदर पार्टी से ही पूछ लीजिएगा। वहाँ फोन लग चुका है, असुविधा नहीं होगी। अच्छा, चलती हूँ।''

अमियवल्लभ ने कहा, ''चूँकि ठहरने नहीं दिया इसीलिए इतनी बड़ी सजा दोगी? थोड़ी-सी चाय तक पिए बगैर चली जाओगी?''

...इच्छा नहीं हो रही है, नानाजी। इतनी गरमी है।''

''तो फिर कोल्ड ड्रिंक?''

अवंती हँसी, ''आपके पास कोल्ड ड्रिंक भी रहती है?''

''कह। कह ले। मौका मिला है। लेकिन कौन-सी वारदात हुई है, बताएगी नहीं?''

''कहने को है ही क्या! कह सकते हैं कि बनाव नहीं हो रहा, गुजारा नहीं हो रहा है।''

''इतनी आसानी से हिम्मत खो बैठोगी, महारानी?''

''आपको लगता है कि आसान है?''

''मासूम नहीं। समझ नहीं पा रहा। यही तो दोनों जने घूमने-फिरने आते थे...''

''हाँ। हँसी-गपशप और सुख का माहौल रहता था। यही न? लेकिन साबुन के फानूस के भी कितने ही रंग हुआ करते हैं। चलती हूँ, नाना जी!''

अमियवल्लभ बोले, ''कहाँ जा रही है?''

''यही समझिए कि जहाँ ये आँखें ले जाएँ।''

अवंती हँस दी। उसके बाद बोली, ''असुविधा इसी बात की है। कहीं-न-कहीं जाना ही होगा। सिर्फ तेल का अशेष भण्डार ले लगातार गाड़ी पर सवार हो सफर नहीं किया जा सकता है। अच्छा नाना जी, आप तो राजा हैं, धन-दौलत से खेलने वाले। कानून जानते हैं। बताइए तो, टूटू मित्तिर का घर अगर छोड़ दूं तो ऐसी हालत में गाड़ी छोड़कर भी आना होगा? आपके द्वारा दी गई इस लाल गाड़ी को?''

अवंती ने 'इस लाल' शब्द का उल्लेख किया, क्योंकि उसे ही चलाकर वह आयी है।

''क्यों? क्यों? यह वात कौन कह रहा है?''

अमियवल्लभ शेर के मानिन्द दहाड़ उठे, ''वह अभागा? कभी भी नहीं। तुम्हारी किसी पर्सनल वस्तु को वह रोककर नहीं रख सकता किसी चीज़ पर उसका अधिकार नहीं है।''

अवंती हँसने लगी। बोली, ''नहीं-नहीं, वह कोई चीज रोककर नहीं रखेगा, बल्कि नतीजा उल्टा ही होगा। लेकिन मैं ज्यादा कुछ नहीं चाहती। सिर्फ गाड़ी के बारे में ही सोचकर मन कैसा-कैसा तो कर

रहा था। मगर वह शर्म का विषय होगा अगर अधिकार न हो। इसलिए जानना चाहती थी कि कानूनन मेरा अधिकार है या नहीं।''

''है। बेशक है। अपने गहने-जेवरात सब-कुछ तुम...पर...''

अमियवल्लभ जैसे एकाएक टूटकर बैठ गए। बोले, ''पर क्या तुम लोग सचमुच ही सम्बन्ध-विच्छेद करना चाहते हो? सुनकर कलेजा चाक हो रहा है। चाय की प्याली में तूफान पैदा कर कहीं बरबादी के रास्ते पर पैर तो नहीं बढ़ा रहो हो? उस साले ने तुझसे क्या कहा है; बताओ तो मुझे?''

अवंती अब फिर सोफे पर बैठ गयी। आँखें उठाकर आहिस्ता से कहा, ''नहीं-नहीं। उसने कुछ नहीं कहा है, नाना जी। गलती मेरी ही है। मैं शायद अपने आपसे ऑनेस्ट बनकर रहना चाहती हूँ। अन्तर्मन से जिससे तालमेल नहीं बिठा पाती हूँ, सही मानी में जिसे प्यार नहीं कर पा रही हूँ, उसकी घर-गृहस्थी में दीन-हीन गृहिणी का रूप धारण कर, सुख के साथ घर-संसार बसाने का अभिनय करते हुए चलना मुझे खुद ही बेईमानी जैसा लगता है।''

''बस, इतना ही।''

अमियवल्लभ को जैसे मँझधार में किनारा मिल गया हो, इसी अन्दाज में बोले, ''बस इतनी-सी बात के लिए इतनी चिन्ता? दोनों में से किसी ने एक-दूसरे पर लाठी से वार नहीं किया है? खून-खराबा नहीं हुआ है? बरतन तोड़न-फोड़ना नहीं हुआ है? तो फिर यह मामला कोई प्रॉब्लम नहीं है।''

अवंती हँसने लगती है।

''काश, नाना जी, आपकी ही तरह सभी सहज ही गणित का प्रश्न हल करके चल पाते।''

''हल करने की चेष्टा करके देखा जाए।''

अमियवल्लभ बोले, ''तुम भी मिलिटरी हो तो मैं भी मिलिटरी हूँ। तुम गुलदस्ता तोड़ेगी तो मैं टेबल-लैपं तोड़ूँगा। पर हाँ, इसके बीच यदि तीसरा व्यक्ति रहेगा तो सब गुड़-गोबर हो जाएगा। कहीं वह छोकरा किसी से फँस तो नहीं गया है?''

अवंती जरा काँप उठी।

टूटू मित्तिर के सम्बन्ध में इस तरह के सन्देह की कोई गुंजाइश है? न:। रहती तो अवंती के अहसास से अगोचर नहीं रह पाती। टूटू पर यह कलंक मढ़ा नहीं जा सकता।

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