जीवनी/आत्मकथा >> प्लेटो प्लेटोसुधीर निगम
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पढ़िए महान दार्शनिक प्लेटो की संक्षिप्त जीवन-गाथा- शब्द संख्या 12 हजार...
प्लेटो के समय से लेकर अठारहवीं सदी तक राजा से मुक्ति पाने की बात किसी भी दार्शनिक के दिमाग में नहीं आई। प्रजातंत्र चाहिए था पर राजा की भी दरकार थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू की टिप्पणी है, ‘‘अठारहवीं शताब्दी में फ्रांस में रूसो, वाल्तेयर और मांतेस्क्य् जैसे अनेक प्रसिद्ध विचारक और लेखक हुए थे। इनकी रचनाएं खूब पढ़ी जाती थीं, इस कारण हजारों साधारण लोग इन्हीं की तरह सोचने-विचारने लगे और इनके मतो की चर्चा करने लगे। इस तरह फ्रांस में एक ऐसा जोरदार मत पैदा हो गया जो धार्मिक भेदभाव और राजनीतिक व सामाजिक परंपराओं के विरुद्ध था। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि न तो दार्शनिक लोग ही और न जनता ही बादशाह से पिंड छुडाना चाहती थी। उस समय गणराज्य की भावना आम नहीं थी और जनता तो सिर्फ यही आशा करती थी कि उसे प्लेटो के बताए दार्शनिक राजा की तरह एक आदर्श राजा मिले जो उसके कष्टों को दूर करे और उसको न्याय तथा थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता दे दे।’’
प्लेटो के अनुसार ‘दार्शनिक राजा’ वे हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं और कप्तान या उसका जहाज, डाक्टर और उसकी दवाइयों के विचार की सादृश्यता का समर्थन करते हैं। उसके अनुसार नौवहन और स्वास्थ्य की चिंता हर व्यक्ति सिर्फ अभ्यास से नहीं कर सकता है।
रिपब्लिक का बहुलांश बताता है कि ऐसा शिक्षा तंत्र कैसे स्थापित किया जाए जो दार्शनिक राजा पैदा कर सके। रिपब्लिक में सुकरात एक सही आदमी की छवि निर्मित करने का प्रयास करता है फिर विभिन्न प्रकार के मानवों का वर्णन करता है जो भिन्न प्रकार के नगरों में रहने वाले धन-प्रेमी से लेकर तानाशाह के रूप में पाए जाते हैं। आदर्श नगर बनाया नहीं जाता परंतु जो विभिन्न प्रकार के कारबार में लगे मनुष्यों और उनकी आत्माओं को उन्नत करता है वही आदर्श नगर बन जाता है।
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