जीवनी/आत्मकथा >> प्लेटो प्लेटोसुधीर निगम
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पढ़िए महान दार्शनिक प्लेटो की संक्षिप्त जीवन-गाथा- शब्द संख्या 12 हजार...
राजनीतिक विचार और ‘रिपब्लिक’
प्लेटो के दार्शनिक विचारों के कई सामाजिक आशय होते थे, विशेषकर आदर्श राज्य या सरकार के बारे में। उसके प्रारंभिक विचारों और परवर्ती विचारों में विपर्यय पाया जाता है। जीवन के मध्यकाल में प्रणीत रिपब्लिक में तथा लाज़ व स्टेट्समैन में उसके प्रमुख सिद्धांतों में से कुछ सिद्धांत निहित हैं। डायलाग्स चूंकि प्लेटो ने लिखे हैं इसलिए यह मान लिया जाता है कि सुकरात प्लेटो का प्रवक्ता है। किंतु सभी मामलों में यह मान्यता सही नहीं है।
सुकरात के शब्दों के माध्यम से प्लेटो कहता है कि समाज की वर्ग संरचना त्रि-आयामी है जो व्यक्ति की आत्मा की संरचना, क्षुधा, प्राण और तर्क के समान है। शरीर के अंग जातियों के समरूप हैं।
उत्पादक, जो पेट (क्षुधा) का प्रतिनिधित्व करता है-कामगार हैं जैसे श्रमिक, बढ़ई, किसान, राज मिस्त्री, व्यापारी, पशुपालक आदि।
वक्ष के प्रतिरूप है सुरक्षा (योद्धा या अभिभावक)-यानी वे लोग जो साहसी, सुदृढ़ और वीर हैं, सशस्त्र सेना में हैं। ये आत्मा के एक भाग प्राण के समान हैं।
शासन, जो मस्तिष्क का प्रतिरूप है (शासक, दार्शनिक राजा)- वे जो बुद्धिमान, विज्ञ, संयमित और ज्ञान-प्रेमी हैं, वे मानवता के हितार्थ निर्णय लेने के उपयुक्त हैं। ये तर्क के अनुरूप हैं परंतु इनकी संख्या कम होती है।
इस विधि के अनुसार (तत्समय) एथेंस के जनतंत्र के सिद्धांत अस्वीकार्य थे क्योंकि बहुत थोड़े लोग शासन करने के पात्र थे। प्लेटो कहता है कि वाग्मिता और अनुभव के बजाय तर्क और बुद्धि का शासन होना चाहिए।
प्लेटो का मानना था कि जब तक राजा के रूप में दार्शनिक शासन करता है या वे जो संप्रति राजा कहलाते हैं वास्तव में दार्शनिकता का प्रश्रय लेकर प्रजा का मार्गदर्शन करते हैं अर्थात् जब तक राजनीतिक सत्ता और दर्शन पूर्णतया एकचित्त नहीं हो जाते या ऐसा करने से वंचित होते हुए शासन संभालते हैं तो नगरों से या मानवीय प्रकृति से बुराइयां नहीं मिटेंगी।
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