जीवनी/आत्मकथा >> प्लेटो प्लेटोसुधीर निगम
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पढ़िए महान दार्शनिक प्लेटो की संक्षिप्त जीवन-गाथा- शब्द संख्या 12 हजार...
कहा जाता है कि प्रत्ययवाद प्लेटो की अनावश्यक सृष्टि है। आलोचना के रूप में यह कथन ठीक हो सकता है परंतु प्लेटो ने प्रत्यय सिद्धांत द्वारा अपनी नैतिक शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करना चाहा था। वह कहना चाहता था कि इस लोक से परे एक सूक्ष्म सत्ताओं का लोक है जो सत्य है, सुदंर है और पूर्ण है। इस प्रकार प्रत्ययों के लोक में विश्वास उत्पन्न करा कर वह मनुष्य का उसी पूर्ण लोक के आदर्शों को अपनाने के लिए प्रेरित करना चाहता था।
शुभ के प्रत्यय को प्लेटो सर्वोत्तम मानता था। ‘शुभ’ परम प्रत्यय था जिससे सभी वस्तुओं के विषय में समझा जा सकता है। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में सभी वस्तुएं दिखाई पड़ने लगती हैं उसी प्रकार शुभ के प्रत्यय (आइडिया आफ गुड) से सब कुछ ज्ञेय हो जाता है। प्लेटो का प्रत्यय सिद्धांत दो तथ्यों के समिश्रण का परिणाम है। एक तो यथार्थ का ज्ञान कैसे प्राप्त होता है और दूसरे यथार्थ का स्वरूप कैसा है, इसे जानने का यह प्रयत्न करता है। इस प्रकार यह ज्ञान के सिद्धांत (थ्योरी आफ नालेज) के साथ-साथ यथार्थ का सिद्धांत (थ्योरी आफ रियलटी) भी है।
प्लेटो के अनुसार ज्ञानी व्यक्ति वह है जो दृष्ट-जगत से दृष्टि हटाकर प्रत्ययों की दुनिया का चिंतन करता है। प्रत्ययों की दुनिया का ज्ञान सच्चा ज्ञान है। वह ज्ञान को तीन रूपों में बांटता है- इन्द्रियजन्य ज्ञान, सम्मतिजन्य ज्ञान और चिंतनजन्य ज्ञान। चिंतनजन्य ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है। प्रत्ययों की दुनिया का ज्ञान इन्द्रियातीत है। यह चिंतन का ही विषय है। विशेष पदार्थों का ज्ञान निम्न कोटि का होता है। पदार्थों के रूप व परिमाण के विषय में लोग भिन्न-भिन्न सम्मतियां रख सकते हैं। अतः यह ज्ञान कहलाने का पात्र नहीं है। सबसे ऊंचा ज्ञान रेखागणित का होता है। किसी त्रिकोण की एक भुजा अन्य दो भुजाओं के योग से छोटी होती हैं यह बोध-सम्मति का विषय नहीं है क्योंकि सभी त्रिकोणों के बारे में यही सही है। गणित के सत्य से भी ऊंचे स्तर पर तत्वज्ञान है। प्लेटो की दृष्टि में वही सच्चा ज्ञान है।
प्लेटो के अनुसार संसार में सत् और असत् दोनों का संयोग है। प्रत्ययों की नकल होने के कारण सांसारिक पदार्थ सत् हैं परंतु एकता व स्थिरता के अभाव में असत् हैं। जहाँ तक दृष्ट-जगत् की उत्पत्ति का प्रश्न है प्लेटो मानता है कि यह स्रष्टा की क्रिया का फल है। सृष्टा की क्रिया से पहले प्रकृति आकार-रहित एवं भेद रहित होती है। सृष्टा इस अभेद प्रकृति को प्रत्ययों का रूप प्रदान करता है।
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