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धर्म-निरपेक्षता की अनोखी मिसाल बादशाह अकबर की प्रेरणादायक संक्षिप्त जीवनी...
सदस्य आपस में मिलने पर ‘अल्ला-हो-अकबर’ और ‘जल्ला-जलाल हूं’ का उच्चारण करते। पूरे प्रणाम का अर्थ है, ‘‘ईश्वर महान है और महान है उसका ऐश्वर्य।’’ सदस्य को मास-भक्षण से बचना होता था और अपने जन्म के महीने में तो मास का स्पर्श भी वज्र्य था। वर्ष गांठ पर प्रीतिभोज और गरीबों को दान-दक्षिणा देनी होती थी। बन्ध्या, गर्भवती स्त्रियों तथा रजस्वला होने से पूर्व कन्याओं के साथ मैथुन का निषेध था। दीने इलाही का न कोई धर्म ग्रंथ था, न पूजास्थल, न कोई आचार्य और न, दीक्षा के अतिरिक्त, कोई अनुष्ठान। अकबर सदस्यों के व्यक्तिगत धर्म में कोई हस्तक्षेप नहीं करता था, वह केवल उनके आध्यात्मिक विकास में योग देना तथा उन्हें सभी धर्मों की मौलिक एकता से प्रभावित करना चाहता था।
अकबर के वास्तविक उद्देश्य से अनभिज्ञ इतिहासकारों ने दीने इलाही की तीव्र आलोचना की। विन्सेंट स्मिथ ने इसे ‘मूर्खता का द्योतक’ बताया, हेग ने इसे ‘लज्जाजनक असफलता’ कहा। बदाऊंनी ने तो यहां तक कह दिया कि इसका प्रचार इस्लाम को विनष्ट करने के लिए किया गया था। जिन इतिहासकारों ने इसे समझा उन्होंने प्रशंसा ही की। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने कहा, ‘‘यह एक ऐसा धर्म था जिसमें सभी धर्मों के गुण विद्यमान थे। इसमें रहस्यवाद, दर्शन तथा प्रकृति पूजा के तत्व संयुक्त थे। यह तर्क पर आधारित था। इसने किसी अंध विश्वास को नहीं अपनाया, किसी ईश्वर या पैगम्बर को स्वीकार नहीं किया और सम्राट ही इसका मुख्या प्रवर्तक था।’’
प्रो0 श्रीराम शर्मा ने अपनी पुस्तक द रिलीजस पालिसी ऑव द मुगल ऐम्परर्स (पृष्ठ 42) में सिद्ध किया है कि अकबर का उद्देश्य किसी धर्म का प्रवर्तन करना नहीं था और निश्चय ही उसने ‘दीन-ए-इलाही’ शब्द का न तो निर्माण किया था न प्रयोग।
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