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धर्म-निरपेक्षता की अनोखी मिसाल बादशाह अकबर की प्रेरणादायक संक्षिप्त जीवनी...
धार्मिक विचारों की जटिलता
अकबर के धार्मिक विचारों की विवेचना करना कठिन है। वह एकेश्वरवादी था। आत्म-चिंतन द्वारा ईश्वर से तादात्म्य स्थापित कर लेना चाहता था। भौतिक जगत के अतिरिक्त एक आंतरिक वास्तविकता को मानता थ। प्रकाश को ईश्वर की सबसे बड़ी देन मानता था। इसी कारण वह सूर्य की पूजा करता था। यह उसकी हिंदू रानियों या पारसियों के प्रभाव के कारण भी हो सकता था परंतु सबसे सशक्त कारण मुगलों का यह अंध विश्वास था कि राजाओं का भाग्य सूर्य से संबंधित होता है। वह सभी प्राणियों के जीवन को दैवी देन मानता था।
जैन आचार्यों (हरि विजय सूरी, विजय सेन सूरी, भानुचंद्र उपाध्याय) से संपर्क में आने से पूर्व ही अकबर जीवों की हत्या को अनुचित मानने लगा था। 1578 ई. से पूर्व ही उसकी शिकार में व मास भक्षण में रुचि कम हो गई थी। संभव है हिंदू साधुओं के संपर्क में आने से अहिंसा की भावना जाग्रत हुई और जैन मुनियों से संपर्क के बाद पुष्ट हुई हो। हिंदुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बादशाह ने गो-वध का निषेध कर दिया गया।
अकबर प्रत्येक कार्य को धार्मिक तथा पवित्र समझता था। वह चाहता था कि लोग मेल तथा सद्भावना के साथ ईश्वर की खोज में आगे बढ़ें; स्वच्छता तथा पवित्रता से जीवन व्यतीत करें। अकबर के बारे में हैवेल की टिप्पणी है, ‘‘राजनीति में उच्चतम धार्मिक सिद्धांतों को समाविष्ट कर उसने भारतीय इतिहास में अपना नाम अमर बना लिया है और इस्लाम के राजनीतिक सिद्धांत को ऊंचा उठा दिया है जैसा कि पहले कभी न था।’’
अकबर अपने विचारों, विश्वासों और व्यवहारों के कारण अन्य लोगों के लिए एक जटिल पहेली बन गया था। अकबर के अभिन्न मित्र, धार्मिक सलाहकार अबुल फजल के विचार में अकबर एक सच्चा मुसलमान था। बदायूंनी की विपरीत टिप्पणी के बावजूद अकबर जीवन-पर्यंत एक सच्चा मुसलमान बना रहा। इस्लाम धर्म के भौतिक सिद्धांतों की उसने कभी उपेक्षा नहीं की। जीवन भर वह इस्लाम के ‘तौहीद’ को पकड़े रहा।
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