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धर्म-निरपेक्षता की अनोखी मिसाल बादशाह अकबर की प्रेरणादायक संक्षिप्त जीवनी...
इबादतखाना यानी जनसंवाद
अकबर को युवावस्था से ही ईश्वर और मनुष्य के आपसी रहस्यात्मक संबंधों में दिलचस्पी थी। वह स्वभाव से ही रहस्यवादी था। आगे चलकर अपने सूफी मित्रों की तरह वह भी परमसत्ता से सीधा संपर्क करके अलौकिक आनंद प्राप्त करना चाहता था। उसे अपनी सफलता पर विश्वास था। वेदांती, सूफी, रहस्यवादी, कवि बड़े ही संवेदनशील होते हैं। वे संसार के दुःख के बारे में सोचते हों तो कोई ताज्जुब नहीं। इस दुःख-चिंतन के आगे तर्क की सीढ़ी चढ़ते हुए वे आनंद की अवस्था तक नहीं पहुंच पाते। वह अवस्था अचानक आती है, अपने आप आती है, इतने वेग से आती है कि मन अभिभूत हो जाता है। बदायूंनी ने अकबर की इस प्रकार की अवस्था आने की बात कही है। अकबर अक्सर निर्विकल्प समाधि में चला जाता। इस अवस्था में देह का बोध नहीं रहता। बुद्धि भी प्रायः लोप हो जाती, बिल्कुल लीन हो जाता। चूंकि अहंकार पूर्णतया लुप्त नहीं हुआ था अतः समाधि से शीघ्र वापस लौट आता। जो लोग ईश्वर में विश्वास करते हैं उनके लिए ऐसी अवस्था में यह सोचना स्वाभाविक होता है कि उन्होंने ईश्वर के साक्षात दर्शन कर लिए हैं।
1573 ई. में जब अकबर गुजरात से लौटा तब शेख मुबारक ने अकबर से निवेदन किया कि जिस प्रकार राजनीति में उसने प्रजा का पथ प्रदर्शन किया है उसी प्रकार धार्मिक मामलों में भी वह उसका गुरु बने और पथ प्रदर्शन करे। अकबर शेख के आशय को समझ गया और उसने धर्म गुरु बनाने की योग्यता प्राप्त करने का निश्चय किया। इसके लिए जरूरी था कि उन दिनों हिंदुस्तान में जितने धर्म प्रचलित थे उनके दर्शन तथा मूल-तत्वों का वह ज्ञान प्राप्त करंें। सबसे पहले उसने इस्लाम धर्म की ही समीक्षा करने का निश्चय किया।
1575 ई. में सत्य की खोज के लिए अकबर ने सीकरी में इबादतखाना (प्रार्थना गृह) का निर्माण कराया। इबादतखाना प्रसिद्ध सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आवास के निकट बनवाया गया था। वहां पहले शेख सलीम चिश्ती के शिष्य शेख अब्दुला नियाजी की झोपड़ी थी जो तत्समय सरहिंद चले गए थे।
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