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धर्म-निरपेक्षता की अनोखी मिसाल बादशाह अकबर की प्रेरणादायक संक्षिप्त जीवनी...
चांद की डोलिया पे होके सवार
अकबर की कई संतानें असमय काल-कलवित हो चुकी थी, अतः संतान की उसकी चाह बढ़ गई थी। जब जयपुर की राजकुमारी हरखा बाई गर्भवती हुई तो अकबर को अपनी आशा फलती दिखाई दी। रानी को ले जाकर शेख सलीमुद्दीन चिश्ती के आवास के समीप ठहराया गया। 30 अगस्त 1569 को हरखा बाई ने एक बालक को जन्म दिया। सलीमुद्दीन चिश्ती के नाम पर उसका नाम सलीम रखा गया। बडे़ उत्सव मनाए गए। कैदी रिहा किए गए। उस समय ऐसा विश्वास था कि नवजात शिशु को जन्म के बाद कुछ समय तक उसके पिता के सामने नहीं ले जाना चाहिए। संयोगवश अकबर उस समय फतेहपुर सीकरी में नहीं था। उस प्रचलित विश्वास का आदर करने के लिए वह तत्काल फतेहपुर सीकरी नहीं लौटा।
ज्योतिषियों ने शहजादे की जन्मकुंडलियां बनाईं । कवियों ने कविताएं लिखीं। ख्वाजा हुसैन ने एक कसीदा लिखा जिसकी प्रत्येक पंक्ति से शहजादे के राज्यारोहरण की तारीख निकलती थी और दूसरी पंक्ति से उसकी जन्मतिथि।
21 नवम्बर 1569 को अकबर की एक अन्य रानी ने पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम खानम रखा गया। 7 जून 1570 को शाह मुराद ने और 9 सितम्बर 1572 दानियाल ने मुगल वंश की अभिवृद्धि की। एक माह बाद दानियाल को लालन-पालन के लिए राजा बिहारीमल की रानी के सुपुर्द कर दिया गया।
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