पंचतंत्र - विष्णु शर्मा Panchtantra - Hindi book by - Vishnu Sharma
लोगों की राय

नई पुस्तकें >> पंचतंत्र

पंचतंत्र

विष्णु शर्मा


E-book On successful payment file download link will be available
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :65
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9838
आईएसबीएन :9781613012291

Like this Hindi book 0

भारतीय साहित्य की नीति और लोक कथाओं का विश्व में एक विशिष्ट स्थान है। इन लोकनीति कथाओं के स्रोत हैं, संस्कृत साहित्य की अमर कृतियां - पंचतंत्र एवं हितोपदेश।

ऋषि और चुहिया

एक वन में एक तपस्वी रहते थे। वे बहुत पहुंचे हुए ऋषि थे। उनका तपस्या बल बहुत ऊंचा था। रोज वह प्रातः आकर नदी में स्नान करते और नदी किनारे के एक पत्थर पर आसन जमाकर तपस्या करते थे। निकट ही उनकी कुटिया थी, जहां उनकी पत्नी भी रहती थी।

एक दिन एक विचित्र घटना घटी। अपनी तपस्या समाप्त करने के बाद ईश्वर को प्रणाम करके उन्होंने अपने हाथ खोले ही थे कि उनके हाथों में एक नन्ही-सी चुहिया आ गिरी। वास्तव में आकाश में एक चील पंजों में उस चुहिया को दबाए उड़ी जा रही थी और संयोगवश चुहिया पंजों से छूटकर गिर पड़ी थी। ऋषि ने मौत के भय से थर-थर कांपती चुहिया को देखा।

ऋषि और उनकी पत्नी के कोई संतान नहीं थी। कई बार पत्नी संतान की इच्छा व्यक्त कर चुकी थी। ऋषि दिलासा देते रहते थे। ऋषि को पता था कि उनकी पत्नी के भाग्य में अपनी कोख से संतान को जन्म देकर मां बनने का सुख नहीं लिखा है। किस्मत का लिखा तो बदला नहीं जा सकता परन्तु अपने मुंह से यह सच्चाई बताकर वे पत्नी का दिल नहीं दुखाना चाहते थे। यह भी सोचते रहते कि किस उपाय से पत्नी के जीवन का यह अभाव दूर किया जाए।

ऋषि को नन्हीं चुहिया पर दया आ गई। उन्होंने अपनी आंखें बंदकर एक मंत्र पढा और अपनी तपस्या की शक्ति से चुहिया को मानव बच्ची बना दिया। वह उस बच्ची को हाथों में उठाए घर पहुंचे और अपनी पत्नी से बोले 'सुभागे, तुम सदा संतान की कामना किया करती थी। समझ लो कि ईश्वर ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली और यह बच्ची भेज दी। इसे अपनी पुत्री समझकर इसका लालन-पालन करो।'

ऋषि पत्नी बच्ची को देखकर बहुत प्रसन्न हुई। बच्ची को अपने हाथों में लेकर चूमने लगी 'कितनी प्यारी बच्ची है। मेरी बच्ची ही तो है यह। इसे मैं पुत्री की तरह ही पालूंगी।'

इस प्रकार वह चुहिया मानव बच्ची बनकर ऋषि के परिवार में पलने लगी। ऋषि पत्नी सच्ची मां की भांति ही उसकी देखभाल करने लगी। उसने बच्ची का नाम कांता रखा। ऋषि भी कांता से पितावत स्नेह करने लगे। धीरे-धीरे वे यह भूल गए की उनकी पुत्री कभी चुहिया थी।

मां तो बच्ची के प्यार में खो गई। वह दिन-रात उसे खिलाने और उससे खेलने में लगी रहती। ऋषि अपनी पत्नी को ममता लुटाते देख प्रसन्न होते कि आखिर संतान न होने का उसे दुख नहीं रहा। ऋषि ने स्वयं भी उचित समय आने पर कांता को शिक्षा दी और सारी ज्ञान-विज्ञान की बातें सिखाई। समय पंख लगाकर उड़ने लगा। देखते ही देखते मां का प्रेम तथा ऋषि का स्नेह व शिक्षा प्राप्त करती कांता बढ़ते-बढ़ते सोलह वर्ष की सुंदर, सुशील व योग्य युवती बन गई। माता को बेटी के विवाह की चिंता सताने लगी।

एक दिन उसने ऋषि से कह डाला, 'सुनो, अब हमारी कांता विवाह योग्य हो गई है। हमें उसके हाथ पीले कर देने चाहिए।'

तभी कांता वहां आ पहुंची। उसने अपने केशों में फूल गूंथ रखे थे। चेहरे पर यौवन दमक रहा था। ऋषि को लगा कि उनकी पत्नी ठीक कह रही हैं। उन्होंने धीरे से अपनी पत्नी के कान में कहा, 'मैं हमारी बिटिया के लिए अच्छे से अच्छा वर ढूंढ निकालूंगा।'

...पीछे | आगे....

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

लोगों की राय

No reviews for this book