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मूछोंवाली

मधुकांत

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9835
आईएसबीएन :9781613016039

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‘मूंछोंवाली’ में वर्तमान से तीन दशक पूर्व तथा दो दशक बाद के 50 वर्ष के कालखण्ड में महिलाओं में होने वाले परिवर्तन को प्रतिबिंबित करती हैं ये लघुकथाएं।

73

नंगी


कच्चे घर में सुन्दरता दबाए भी तो नहीं दबती। आस पड़ोस के जंगले उसे घूरते रहते... उनकी खिड़कियां भी इसलिए उस बेचारी से नाराज रहतीं। पर इसमें उसका क्या दोष...। पति खेतों में मजदूरी करके लौटता तो वह निहाल हो जाती।

धीरे-धीरे सभी मकानों के जंगले उधर खुलने लगे। उसको नाना प्रकार के प्रलोभन दिए गए... पर उसने स्वीकारा नहीं... इसलिए जंगलों की सलाखें और भी पैनी हो गई।

गैर समय पति को खेतों में जाते देख उसका माथा तो ठनका था लेकिन मालिक का हुक्म, वह चुप रही। सारी रात जलते-जलते दीए का तेल चुक गया था और उसकी माँग का सिंदूर सुबह की पहली किरण के साथ उड़ गया।

सबकी आंखें तो उसके रूप पर लगी थी... कौन ढांढस बंधता। अकेली रो-रोकर वक्त काटने लगी और खेतों पर भी जाने लगी। कइयों की नजर अब उस खजाने पर लगी रहती।

एक रात उन्होंने उसकी कच्ची दीवार में सेंधलगा ही दी।

रात-भर वह अचेत पड़ी रही। सुबह आस-पड़ोस वालों ने देखा, पर बोलता कौन, सेंध उन्हीं की ओर से लगी थी।

एक अधेड़ महिला ने सेंध को ढक देना चाहा लेकिन... आश्चर्य... दीवार ने अपने ऊपर एक कपड़ा भी न पड़ने दिया। हारकर सब अपने-अपने घर लौट गए।

कई दिन तक तो लोग कौतुहलवश उधर आए लेकिन उसे नग्न देखकर उन्होंने अपने बच्चों को उधर जाने से मना कर दिया।

फिर एक दिन वह सेंध लगी दीवार वहां से निकलकर गली में आ गई। लोगों ने उसे कनखियों से देखा।

गली से निकलकर वह सदर बाजार में आ गई। चलते-चलते अचानक वह किसी भी बड़ी दुकान के सामने ठहर जाती। अन्दर बैठा सम्मानित व्यक्ति उसे देखकर अपनी नजरें झुका लेता तब उसकी खिल-खिलाहट सारे बाजार में फैलने लगती।

 

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