धर्म एवं दर्शन >> प्रेममूर्ति भरत प्रेममूर्ति भरतरामकिंकर जी महाराज
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भरत जी के प्रेम का तात्विक विवेचन
तो दूसरी ओर उनका यह कथन है कि राम-राज्याभिषेक ही मंगलमय है, किस उपाय से वे लौटेंगे? इस पर विचार कीजिए? दोनों का विरोध स्पष्ट है। भाषण से यह भी स्पष्ट है कि वास्तव में वे राजाज्ञा (जिसका अर्थ है वन-गमन की स्वीकृति) के पक्ष में है। किन्तु चतुर वक्ता की भाँति अन्तिम वाक्य उपस्थित सभासदों तथा श्री भरत को सन्तुष्ट करने के लिए जोड़ दिया है। उनकी यह भावना प्रत्येक शब्द से स्पष्ट हो रही है। सारा भाषण राम के ऐश्वर्य और मर्यादा-पालन की प्रशंसा में है। एक शब्द भी रावण की भक्तवत्सलता का ज्ञापन नहीं करता। इस भाषण में एक विलक्षण क्रम है। महर्षि क्रमशः राम का ऐश्वर्य स्पष्ट करते-करते अन्त में पूर्ण स्वरूप व्यक्त कर देते हैं। उनका प्रथम वाक्य है रविवंश शिरोमणि धर्म-धुरीण समग्र ऐश्वर्यों से युक्त राजाराम स्वतन्त्र हैं। पर जैसे उन्हें लगता है कि ‘स्वतन्त्र’ कहकर मैंने एक भूल कर दी, तब तो वे लौट भी सकते हैं। यद्यपि भगवान् राम के ऐश्वर्य का प्रतिपादन करने का उनका एकमात्र अभिप्राय इस धारणा का खण्डन करना है कि उन्हें वन में कोई कष्ट है, या कैकेयी की कुचेष्टा से उन्हें बन आना पड़ा। किन्तु ‘स्वबस’ शब्द दोनों पक्षों की धारणा का समर्थन कर सकता है। अतः महर्षि ने दूसरे वाक्य में उनकी सत्य-सन्धता और श्रुति-आज्ञानुसारिता का उल्लेख कर दिया। अभिप्राय यह है कि यद्यपि वे स्वतन्त्र हैं, पर स्वयं अपने बनाये नियमों को भंग नहीं कर सकते हैं। एक बार निर्णय कर लेने पर सत्य-सन्ध राम उसे परिवर्तित नहीं कर सकते। उनका जन्म विश्वमंगल के लिए हुआ है। थोड़ा भी भ्रम न रहने देने के लिए उपर्युक्त सत्य-सन्धता श्रुति-सेतु-पालकता और जग-मंगल तीनों का अर्थ स्पष्ट कर देते हैं।
गुरु पितु मातु बचन अनुसारी।
खल दलु दलन देव हितकारी।।
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