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जयशंकर प्रसाद की कहानियां

जयशंकर प्रसाद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :435
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9810
आईएसबीएन :9781613016114

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जयशंकर प्रसाद की सम्पूर्ण कहानियाँ


विश्वामित्र त्रिशंकु से प्रसन्न हुए। तपस्या कर रहे हैं, किन्तु ईर्ष्या ने हृदय का अधिकार नहीं छोड़ा। वशिष्ठ के प्रतिकूल होकर कार्य करने में वह बहुत ही आनन्दित हुए, और यज्ञ कराना स्वीकार किया। ‘मधुच्छन्दा’ इत्यादि पुत्रों को आज्ञा दी कि वे यज्ञ का समारोह करें। और, ब्रह्मवादियों को भी निमन्त्रण दिया गया। सब होने लगा। किन्तु, वहाँ जाता ही कौन है?

वशिष्ठ-पुत्रों ने सब से कह दिया था कि- ”चाण्डाल यजमान और क्षत्रिय आचार्य द्वारा सम्पादित यज्ञ में कौन भाग लेगा!”

आवाहन करने पर भी पुरोडाश ग्रहण करने के लिए देवगण नहीं आये। विश्वामित्र क्रोधान्वित हुए, श्रुवा पटककर कहा- ”यज्ञ में विघ्न डालनेवाले वशिष्ठ-पुत्र भस्म हों, और त्रिशंकु विश्वामित्र के तपस्या-बल से सदेह स्वर्ग जाय।”

त्रिशंकु स्वर्ग की ओर चला, किन्तु, देवराज ने कहा- ”तिष्ठ तिष्ठ” - त्रिशंकु अध:पतित हुआ। विश्वामित्र ने कहा- ”अब हम नई सृष्टि करेंगे, और बर्बरों को सभ्य बनावेंगे।” देवगण चकित हुए, और उनके अनुरोध से त्रिशंकु पुन: नक्षत्र रूप में स्थित हुए। विश्वामित्र के नव-कल्पित एक नक्षत्र-गोलक में नव-सृष्टि से त्रिशंकु रहने लगे। उधर अग्न्यास्त्र-रूपी श्राप से वशिष्ठ-पुत्र भस्मीभूत हुए।

विश्वामित्र ऐसा उग्र कार्य करके कुछ शान्त हुए, और तपस्या करने लगे। लोग उन्हें ‘ऋषि’ कहने लगे। वह भी निरन्तर तपस्या से त्रैलोक्य को कम्पित करने लगे।

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