हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन - मोहनदेव-धर्मपाल Hindi Sahitya Ka Digdarshan - Hindi book by - Mohandev-Dharmapal
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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन

मोहनदेव-धर्मपाल


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :187
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9809
आईएसबीएन :9781613015797

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हिन्दी साहित्य का दिग्दर्शन-वि0सं0 700 से 2000 तक (सन् 643 से 1943 तक)

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

निरालाजी का जन्म संवत् १९५३ में माघ शुक्ला एकादशी को हुआ था। उनके पिता पं० रामसहाय त्रिपाठी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे और उन्नाव जिले के गढ़कोला नामक गाँव के रहने वाले थे। जीविका प्राप्त करने के लिए उन्हें बंगाल जाना पड़ा। बंगाल में वे मेदनीपुर के महिषादल राज्य में नौकरी करते थे। यहीं निराला का जन्म हुआ और यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी हुई। इनके पिता को राजदरबार में विशेष सम्मान प्राप्त था। उनकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी थी, इस लिए उन्होंने अपनी ओर से निराला जी की शिक्षा का उचित प्रबन्ध कर रखा था।

निराला जी अपनी बाल्यावस्था ही से स्वतन्त्रता-प्रिय थे। किसी प्रकार का बन्धन उन्हें अप्रिय था। पाठशाला की पढ़ाई उनके स्वभाव के प्रतिकूल थी, इसलिए उन्होंने विविध कलाओं का ज्ञान और अभ्यास करना आरम्भ कर दिया। अध्ययन के अतिरिक्त उन्हें कुश्ती लड़ने और अश्वारोहण में भी विशेष आनन्द मिलता था। संगीत के प्रति भी उनको बचपन से ही अनुराग था। वहाँ पर बोलचाल की भाषा बँगला होने के कारण उनका बँगला-साहित्य से भी स्वाभाविक सम्पर्क है। मध्यवित्त परिवार के बालक थे, अत: बचपन में इन्हें किसी प्रकार के अभाव का सामना नहीं करना पड़ा। आपका विवाह १३ वर्ष की छोटी-सी आयु में ही हो गया। आपके सरोज नामक पुत्री तथा रामकृष्ण नामक पुत्र दो संतानें हुईं। पली-पोसी पुत्री सरोज का विवाह भी कवि ने कर दिया था; किन्तु वह इनके व्यथित जीवन को और भी अधिक करुण बनाकर इस संसार से सदा के लिए विदा हो गई। पुत्री की मृत्यु से पूर्व ही उनकी आदर्श पतिपरायणा विदुषी पत्नी मनोहरा देवी भी स्वर्ग सिधार चुकी थीं। २२-२३ वर्ष की छोटी-सी अवस्था में पत्नी और पुत्री के उठ जाने के कारण कवि का जीवन अत्यन्त निराशामय हो गया। कवि की यह वेदना उनकी अनेक कविताओं में करुणा की अजस्र धारा के रूप में फूट पड़ी है। पिता के स्वर्ग सिधार जाने के एक-दो वर्ष बाद तक इनका जीवन निश्चिन्त-सा रहा पर पत्नी की मृत्यु के पश्चात् एक के बाद दूसरे संकटों का प्रारम्भ हुआ, यहाँ तक कि इन विविध विपत्तियों के कारण ही यह महान् कलाकार कई वर्षों तक विक्षिप्त-सी अवस्था में जीवन-यापन करता रहा।

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