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तिरंगा हाउस

मधुकांत

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :182
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9728
आईएसबीएन :9781613016022

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समकालीन कहानी संग्रह

पूरा सप्ताह स्कूल ठीक-ठाक चला, दरियाव सिंह प्रतिदिन सुबह अंधेरे शौच जाते आयरन की पोटली तालाब में फेंक देते। सोमवार को अस्वस्थ होने के कारण पी.टी.आई. दरियाव सिंह की आंख देर से खुली। अपनी पोटली उठाकर जैसे ही वह तालाब के किनारे पहुंचे तो देखकर दंग रह गये, तालाब के किनारे ढेर सारी मोटी मोटी मछलियाँ देखकर वे चौंक गए। इतनी बड़ी बड़ी मछलियाँ उसने कभी नहीं देखी थी। जैसे ही उन्होंने पोटली तालाब में फेंकी मछलियाँ झपट पड़ीं। एक क्षण में ही मछलियाँ सारी टेबलेट लेकर भाग गयी। इस अभूतपूर्व दृश्य को देखकर दरियाव सिंह गद्गद हो गये। मछलियों के स्थान पर उसे अपने गांव के तंदरुस्त छात्र नजर आने लगे। इन आयरन गोलियों का कमाल..... काश मेरे गांव के बच्चों को अकल आ जाती...... काश वे इन गोलियों को खा लेते। अब वह सारे बच्चों को और माता-पिताओं को इस तालाब पर बुलाकर दिखाएगा, आयरन की गोलियों का कमाल.....।’ तालाब से लौटते हुए दरियाव सिंह को स्वयं पर भी गुस्सा आ रहा था कि इतनी बहुमूल्य गोलियों को तालाब में फेंककर बर्बाद कर दिया। उसे अपने अध्यापक होने पर भी पश्चाताप हो रहा था कि छात्रों पर उसका प्रभाव नहीं है।

स्कूल जाते हुए पी.टी.आई दरियाव सिंह आत्म विश्वास से भरे थे। मन में एक संकल्प लिया था कि अपने गांव और अपने स्कूल के सभी बच्चों को आयरन टेबलेट अवश्य खिलाएंगे चाहे उनके मां-बाप से मिलने के लिए कितनी भी भागदौड करनी पड़े। आज चुस्त और कठोर कदमों के साथ उन्होंने स्कूल में प्रवेश किया।

 

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