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तिरंगा हाउस

मधुकांत

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :182
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9728
आईएसबीएन :9781613016022

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समकालीन कहानी संग्रह

एक दिन दमयंती ने बदल से पूछा-’बेटे तू बड़ा होकर क्या बनना चाहता है?

मां के पैर दबाते हुए बदल बोला- अध्यापक, मां मैं शिक्षक बनना चाहता हूँ क्योंकि समाज में सबसे अधिक प्रभाव अध्यापक का है और देश उसे राष्ट्र निर्माता मानता है।

बी० ए० करने के बाद उसने बी० एड़० में प्रवेश ले लिया। अध्यापक बनने की यह प्रथम प्रक्रिया थी। परीक्षा देने के बाद रिजल्ट आने तक वह एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षण करने लगा और मुश्किल से एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि सरकारी स्कूल में नियुक्ति हो गयी।

अघ्यापक बनने के बाद भी बदल प्रति सायं को मां के पास एक घंटा बैठता, सेवा करता, गांव के समाचार सुनाता और अपने स्कूल की बातें बताता। उसका स्कूल घर से तीन किलोमीटर की दूरी पर था परन्तु बदल वहाँ आसानी से साइकिल पर चढ़कर चला जाता। मां को लगता वह थक जाता होगा। इसलिए वह उसको अपने पास अधिक देर तक न बैठने देती।

‘बदल, अब तूं गुरू बन गया है, रोज रोज बैठकर मां के पांव मत दबाया कर’-

‘मां, गुरू तो मैं बच्चों के लिए हूँ। मुझे गुरू बनाने वाली तो तुम हो मां। तुम्हारा ऋण मैं कैसे उतार सकता हूँ- कहकर बदल अधिक बल से मां के पांव दबाने लगता।

दमयंती अपने पांवों को समेट लेती- ’फिर भी बेटा सारे दिन बच्चों के साथ मगज-पच्ची करके, साइकिल चलाकर घर लौटता है तो थक ही जाता होगा, जा अब अपने कमरे में जाकर अराम कर ले।’ विवश बदल को अपने कमरे में जाना पड़ता।

जिला शिक्षा अधिकारी बदल से बहुत खुश थे। कार्यालय का काम अधिक होने पर वे सबसे पहले उसे ही बुलाते। स्कूल के अध्यापक मुख्याध्यापक इसलिए उससे खुश रहते क्योंकि वह सबकी पैंसन, वेतन वृद्धि, डी० ए०, छुट्टियों का लेखा जोखा सब समय पर होता रहता था। स्कूल में सब उसे बदल के स्थान पर राणा जी कहने लगे, और गांव के बुजुर्ग उसे बदलराम कहकर पुकारने लगे।

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