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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
उसने मेरे मुँह की ओर देखकर न जाने क्या सोचा और फिर पूँछ हिलाना शुरू कर दिया। मैंने कहा, “अब भी तू यहीं है?”
उसने प्रत्युत्तर में सिर्फ दोनों मलिन आँखें खोलकर अत्यन्त निरुपाय की तरह मेरे मुँह की तरफ देखा।
इसमें शक नहीं कि यह यशोदा का कुत्ता है। फूलदार रंगीन किनारी का गल-पट्टा अब भी उसके गले में है। मैं समझ ही न सका कि उस नि:सन्तान रमणी के एकान्त स्नेह का धन यह कुत्ता आज भी इस परित्यक्त कुटी में क्या खाकर जीवित है। मुहल्लों में जाकर छीन झपट कर खाने का जोर तो उसमें है नहीं, आदत भी नहीं है, और स्वजाति के साथ मेल रखने की शिक्षा भी उसे नहीं मिली। लिहाजा भूखा और अधभूखा रहकर यहीं पड़ा पड़ा बेचारा शायद उसी की राह देख रहा है, जो उसको एक दिन प्यार करती थी। सोचता होगा कि कहीं न कहीं गयी है, एक न एक दिन लौटकर आयेगी ही। मन ही मन कहा, यही क्या ऐसा है? इस प्रत्याशा को बिल्कुल ही पोंछ डालना संसार में क्या इतना आसान है?
जाने के पहले छप्पर की सैंध में से एक बार भीतर की ओर दृष्टि डाली। अन्धकार में और तो कुछ भी दिखाई न पड़ा, दीवार पर चिपकी हुई कुछ तसवीरें नजर आ गयी। राजा रानी से लेकर नाना जाति के देवी-देवताओं तक की तसवीरें हैं। कपड़े के नये थानों में से निहाल निकाल कर यशोदा इन्हें संग्रह करती थी और इस तरह वह अपना तस्वीरों का शौक मिटाती थी। याद आया कि बचपन में इनको अनेक बार मुग्ध दृष्टि से देखा है। बारिश से भीगकर, दीवार की मिट्टी से बिगड़ कर, ये आज भी किसी तरह टिकी हुई हैं।
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