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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
वैष्णवी अब नहीं है, पता नहीं कि वह कब मर गयी, शायद बहुत दिन नहीं हुए। पेड़ के एक किनारे और एक छोटे चबूतरे पर नज़र पड़ी, शायद यह यशोदा की समाधि होगी। बहुत सम्भव है कि सुदीर्घ प्रतीक्षा के बाद उसने भी पति के पास ही अपने लिए थोड़ा-सा स्थान कर लिया हो। स्तूप की खुदी हुई मिट्टी ज्यादा उर्वर हो जाने के कारण बिच्छू खूब हो गये हैं और पेड़ को चमगीदड़ों ने छा दिया है- सँभालने वाला कोई नहीं है।
रास्ता छोड़कर शैशव के उस परिचित बूढ़े पेड़ के पास जाकर खड़ा हो गया। देखा कि शाम को जलने वाला वह दीपक नीचे पड़ा है और उसके ऊपर की वह सूखी डाल आज भी वैसी ही तेल से काली हो रही है।
यशोदा का छोटा-सा घर अभी तक पूरी तरह ढहा नहीं है- सहस्र-छिद्रमय और जीर्ण-शीर्ण फूस का छप्पर दरवाजे को ढककर औंधा पड़ा हुआ आज भी प्राणपण से रक्षा कर रहा है।
बीस-पच्चीस वर्ष पहले की न जाने कितनी बातें याद आ गयीं- बाँसों के घेर से घिरा हुआ लिपा-पुता यशोदा का आँगन, और वही छोटा-सा कमरा। उसकी आज यह दशा है! पर इससे भी बहुत ज्यादा एक करुण वस्तु अब भी देखने को बाकी थी। अकस्मात् देखा कि उसी घर के टूटे छप्पर के नीचे से एक कंकाल-शेष कुत्ता बाहर निकला। मेरे पैरों की आवाज से चकित होकर शायद उसने मेरे अनधिकार-प्रवेश का प्रतिवाद करना चाहा। पर उसकी आवाज इतनी क्षीण थी कि उसके मुँह में ही रह गयी।
कहा, “क्यों रे, मैंने अपराध तो नहीं किया?”
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