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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
नवीन ने फौरन स्वीकार कर कहा, “यह ठीक है। वह धूर्त ब्राह्मण बड़ा झाँसेबाज है। पर कहिए, विश्वास कैसे न करूँ? उस दिन खामख्वाह मेरे ही लड़के के नाम दस बीघा ज़मीन दान कर दी। बहुत मना किया पर नहीं सुना। मानता हूँ कि बाप बहुत रख गया है, पर बाबू, इस तरह बाँटने से कितने दिन चलेगा? एक दिन क्या कहा, जानते हैं? कहा, हम फकीर के वंश के हैं, फकीरी तो हमसे कोई छीन नहीं लेगा? लीजिए, सुनिए इनकी बातें!”
नवीन चला गया। एक बात पर ध्यान गया। यह उसने एक बार भी न पूछा कि मैं किसलिए इतने दिनों से मठ में पड़ा हुआ हूँ। नहीं जानता कि पूछता तो मैं क्या कहता, पर मन ही मन शर्मिन्दा हुआ। उससे ही और एक खबर मिली कि कालिदास बाबू के लड़के का ब्याह कल धूमधाम से हो गया। सत्ताईस तारीख का मुझे खयाल ही न रहा।
नवीन की बातों पर मन ही मन विचार करते-करते अकस्मात विद्युत-वेग से एक सन्देह उठ खड़ा हुआ- वैष्णवी किसलिए चली जाना चाहती है? कहीं उस मोटी भौंहों वाले कुरूप आदमी के डर से तो नहीं, जो कण्ठी बदलकर पाये हुए पतित्व का दावा करता है? और यह गौहर? मेरे यहाँ रहने के सम्बन्ध में ही शायद इसीलिए वैष्णवी ने इस दिन सकौतुक कहा था कि गुसाईं, मैं अगर तुम्हें पकड़कर रखे रहूँ तो वे नाराज़ नहीं होंगे। नाराज होनेवाले आदमी वे नहीं हैं। पर अब वह क्यों नहीं आता? उसने अपने मन ही मन न जाने क्या सोच लिया है। संसार में गौहर की आसक्ति नहीं है, अपना कहने को भी कोई नहीं है। रुपया-पैसा, धन-दौलत तो उसके लिए ऐसे हैं मानो उन्हें लुटा देने पर ही उसे चैन मिलेगी। प्रेम अगर उसने किया भी हो तो इस डर से वह मुँह खोलकर शायद किसी दिन कहेगा भी नहीं कि कहीं पीछे किसी अपराध का स्पर्श न हो जाए। वैष्णवी यह जानती है। उस अनतिक्रम्य बाधा से चिर-निरुद्ध प्रणय के निष्फल चित्त-दाह से इस शान्त और स्वयं को भूले हुए मनुष्य को बचाने के लिए ही शायद वह यहाँ से भाग जाना चाहती है। नवीन चला गया है और मैं बकुल के नीचे बैठकर उस टूटी वेदी के ऊपर अकेला बैठा हुआ सोच रहा हूँ। घड़ी खोलकर देखी। यदि पाँच बजे की ट्रेन पकड़ना है तो अब और देर नहीं की जा सकती। पर हर रोज न जाना ही इस तरह आदत में दाखिल हो गया था कि जल्दी से उठकर चल देने के लिए आज भी मन पीछे हटने लगा।
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