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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“पर उसे क्या मालूम होगा नवीन?”
“वे नहीं जानती? सब जानती हैं।”
और ज्यादा बहस न करके मैं उत्तेजित नवीन को मठ के बाहर ले आया। कहा, “वास्तव में नवीन, कमललता कुछ नहीं जानती। खुद बीमार होने के कारण वह तीन चार दिन से अखाड़े के बाहर भी नहीं निकली।”
नवीन ने विश्वास नहीं किया। नाराज होकर कहा, “नहीं जानती? वह सब जानती है। वैष्णवी कौन-सा मन्तर नहीं जानती? वह क्या नहीं कर सकती? यदि कहीं वह नवीन के पल्ले पड़ी होती तो उसका आँख-मुँह मटकाना और कीर्तन करना सब बाहर निकाल देता। लौंडे ने बाप के इतने रुपये पैसे मानो जादू से उड़ा दिये!”
उसे शान्त करने के लिए कहा, “कमललता रुपये लेकर क्या करेगी, नवीन? वैष्णवी है; मठ में रहती है, गाना गाकर, भीख माँगकर ठाकुर-देवता की सेवा करती है। दो दफे दो मुट्ठी खाती ही तो है और क्या! इसलिए मुझे तो ऐसा नहीं लगा कि वह रुपयों की भिखारिनी है नवीन!”
नवीन कुछ ठण्डा होकर बोला, “अपने लिए नहीं-यह तो हम भी जानते हैं। देखने में भी वह भले घर की लड़की जैसी लगती है। वैसा ही चेहरा और वैसी ही बातचीत। बड़े बाबाजी भी लोभी नहीं हैं, पर उन्होंने वैष्णवियों का पूरा एक झुण्ड का झुण्ड जो पाल रक्खा है! ठाकुर-सेवा के नाम पर उन लोगों को हुलुआ-पूड़ी और दूध-घी रोज जो चाहिए! नयन चाँद चक्रवर्ती के मुँह पर घुसफुस सुनी है कि अखाड़े के नाम बीस बीघा ज़मीन खरीदी गयी है! कुछ भी नहीं रहेगा बाबू, जो कुछ है सब एक दिन बैरागियों के पेट में चला जायेगा।”
कहा, “पर यह अफवाह शायद सच नहीं है। और तुम्हारा वह नयन चक्रवर्ती भी तो कम नहीं है!”
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