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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
रास्ते के किनारे बाँसों के घेर से घिरा हुआ आश्रम का फूलों का एक बगीचा है। ठाकुरजी की दैनिक पूजा के लिए यहीं से फूल आते हैं। खुली हुई जगह में अन्धकार नहीं है पर उजाला भी उतना नहीं हुआ है। फिर भी देखा कि अगणित खिले हुए चमेली के फूलों से सारा बगीचा मानो सफेद हो रहा है। सामने के पत्तों झड़े हुए मुण्डे चम्पे के झाड़ में तो फूल नहीं हैं, परन्तु, उसके पास ही कहीं कुछ रजनीगन्धा के फूल असमय में फूल रहे हैं जिनकी मधुर गन्ध से उस त्रुटि की पूर्ति हो गयी है। और सबसे अधिक मन को लुभा लेनेवाला था बीच का हिस्सा। रात्रि के अन्त में इस धुँधले आलोक में पहचाने जाते थे एक दूसरे से भिड़े हुए झुण्ड के झुण्ड गुलाब के झाड़- जिनमें बेशुमार फूल थे और जो सहस्रों फैली हुई लाल आँखों से बगीचे की दिशाओं की ओर मानो ताक रहे थे। पहले कभी इतने सबेरे शय्या छोड़कर नहीं उठा था, यह समय हमेशा निद्राच्छन्न जड़ता की अचेतनता में कट जाता है। बता नहीं सकता कि आज कितना अच्छा लगा। पूर्व के रक्तिम दिगन्त में ज्योतिर्मय का आभास मिल रहा है, और उसकी नि:शब्द महिमा से सारा आकाश शान्त हो रहा है। यह लतिकाओं और पत्तों से, शोभा और सौरभ से और अगणित फूलों से परिव्याप्त सम्मुख का उपवन- सभी मिलकर ऐसा लगा कि जैसे यह रात्रि की समाप्तप्राय वाक्यहीन बिदा की अश्रुरुद्ध भाषा हो। करुणा, ममता और अयाचित दाक्षिण्य से मेरा समस्त अन्तर पलक मारते ही परिपूर्ण हो उठा, सहसा कह उठा, “कमललता, जीवन में तुमने अनेक दु:ख-दर्द पाये हैं, प्रार्थना करता हूँ कि इस बार तुम सुखी होओ।”
वैष्णवी फूलों की डलिया को चम्पे की डाल पर लटका कर सामने की बाढ़ का दरवाजा खोल रही थी कि उसने आश्चर्य से लौटकर देखा और कहा, “अचानक तुम्हें हो क्या गया गुसाईं?” अपनी बातें अपने ही कानों में न जाने कैसी बेढंगी लग रही थीं, उस पर उसके सविस्मय प्रश्न से मन ही मन बहुत अप्रतिभ हो गया। कोई जवाब नहीं सूझा, लज्जा को ढकने के लिए एक अर्थहीन हँसी की चेष्टा भी ठीक तरह सफल नहीं हुई, अन्त में चुप हो रहा।
वैष्णवी ने भीतर प्रवेश किया, साथ ही मैंने भी। फूल तोड़ते हुए उसने खुद ही कहा, “मैं सुख में ही हूँ गुसाईं। जिनके पाद-पद्मों में अपने को निवेदन कर दिया है वे दासी का कभी परित्याग नहीं करेंगे।”
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