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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“क्या पता, पहले सुबह तो होने दो।”

वैष्णवी ने जवाब नहीं दिया, कुछ देर बाद गुनगुनाकर गाने लगी-

चण्डिदास कहे सुन विनोदिनी, सुख-दुख दोनों भाई।

सुख के कारण प्रीति करे जो, दुख भी ता ढिंग आई ।।

रुकने पर कहा, “इसके बाद?”

“इसके बाद और नहीं याद।”

कहा, “तो कुछ और गाओ-”

वैष्णवी ने वैसे ही मृदु स्वर में गाया...

चण्डिदास कहे सुन विनोदिनी, प्रीति को बात न भावै।

प्रीति के कारन प्रान गँवावै, आखिर प्रीति ही पावै ।।

इस बार उसके रुकने पर बोला, “इसके बाद?”

वैष्णवी ने जवाब दिया, “इसके बाद और नहीं है, यहीं शेष है।”

इसमें शक नहीं कि शेष ही है। दोनों ही चुप हो रहे। बहुत इच्छा होने लगी कि द्रुतपदों से नज़दीक जाकर और कुछ कहकर इस अन्धकार-पथ पर उसका हाथ पकड़कर चलूँ। जानता हूँ कि वह नाराज नहीं होगी, बाधा नहीं देगी, पर किसी भी तरह पैर नहीं चले, मुँह से भी एक शब्द नहीं निकला। जैसे चल रहा था वैसे ही धीरे-धीरे चुपचाप जंगल के बाहर आ पहुँचा।

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