|
ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
|||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
प्यारी बड़ी देर तक चुप रहकर मेरे मुँह की ओर देखकर अन्त में धीरे-धीरे बोली, “बहुत ठीक, तो फिर, तुम भी मुझे नहीं रोक सकोगे।”
मेरे जवाब देने के पहले ही रतन की खाँसी का शब्द द्वार के निकट सुन पड़ा।
प्यारी ने पुकार कर कहा, “क्या है रतन?”
रतन ने मुँह आगे निकाल कर कहा, “माँ रात बहुत बीत गयी है- बाबूजी के खाने के लिए ले न आऊँ? रसोइया महाराज तो झोंके खाते-खाते रसोईघर में ही सो गये हैं।”
“अरे, तब तो तुममें से किसी ने भी अभी तक खाया न होगा!” इतना कह कर प्यारी घबड़ाकर और लज्जित होकर उठ खड़ी हुई। मेरे लिए खाने को वह अपने ही हाथों हमेशा लाती थी; आज भी लाने के लिए जल्दी से पैर बढ़ाती हुई चली गयी।
खाना समाप्त करके जब मैं बिस्तर पर लेटा तब रात का एक बज गया था। प्यारी फिर आकर मेरे पैरों के पास बैठ गयी। बोली, “तुम्हारे लिए अनेक रातें अकेले जागकर बिताई हैं- आज तुम्हें भी जागते रक्खूँगी। इतना कहकर मेरी सम्मति की राह देखे बगैर ही उसने मेरे पैर की तरफ का तकिया खींच लिया और बाएँ हाथ का सहारा लेकर वह लेट गयी तथा बोली, “मैंने बहुत विचार कर देखा, तुम्हारा इतने दूर-देश जाना किसी तरह भी नहीं हो सकता।”
मैंने पूछा, “तो फिर, क्या हो सकता है? इसी तरह यहाँ-वहाँ भटकते फिरना?”
|
|||||











