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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
किन्तु, प्यारी ने जवाब तक नहीं दिया तब मैंने उसे जोर से उठाया। उठाते ही मैंने देखा कि उसके नीरव आँसुओं से वहाँ की सारी चादर बिल्कुल भीग गयी है। खींच-तान करने पर वह रुद्ध कण्ठ से बोल उठी, “पहले मेरी दो-तीन बातों का जवाब दो तब मैं उठूँगी।”
“कहो, कौन-सी बातें हैं।”
“पहले तो यह कहो कि उन लोगों के यहाँ रहने से तुमने मेरे सम्बन्ध में कोई बुरा खयाल तो नहीं किया?”
“नहीं।”
प्यारी और कुछ देर चुप रहकर बोली, “किन्तु, मैं भली औरत नहीं हूँ, यह तो तुम जानते हो? फिर भी, तुम्हें क्यों सन्देह नहीं हुआ?”
सवाल बड़ा ही कठिन था। वह भली स्त्री नहीं है, यह मैं जानता हूँ परन्तु वह खराब है, यह खयाल भी मैं मन में नहीं ला सका। मैं चुप हो रहा।
एकाएक वह अपनी आँखें पोंछकर झटपट उठ बैठी और बोली, “अच्छा, तुमसे पूछती हूँ; पुरुष कितना ही बुरा क्यों न हो, यदि वह भला होना चाहता है तो उसे कोई रोकता नहीं; किन्तु, हम लोगों की पारी आने पर सब मार्ग क्यों बन्द हो जाते हैं? अज्ञान से, धनाभाव से, एक दिन जो कर बैठी - चिरकाल के लिए मुझे वही क्यों करना पड़ता रहे? हम लोगों को तुम लोग क्यों भला बनने नहीं देते?”
मैंने कहा, “हम लोग तो कभी रोकते नहीं। और यदि हम रोकें, तो भी, संसार में भले बनने के मार्ग में कोई किसी को अटकाकर नहीं रख सकता।”
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