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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


डॉक्टर ने कहा, दरिद्र किसानों की भलाई करना चाहो तो करो, मैं तुम लोगों को आशीर्वाद देता हूं। लेकिन यह समझना व्यर्थ है कि तुम हमारे कामों में सहायता कर रहे हो। किसान लोग राजा हो जाएं। धन-सम्पन्न और श्रीमान हो जाएं लेकिन मैं उनसे सहायता की आशा नहीं करता।.... फिर अपूर्व की ओर देखकर उन्होंने कहा, किसी की भलाई करने के लिए किसी दूसरे पर स्याही डाल ही देनी पड़ेगी। इसका कोई अर्थ नहीं है। इनके दु:ख-दैन्य की जड़ के शिक्षित भद्र जाति के लोग नहीं हैं। उसकी जड़ का पता लगाने के लिए तुम्हें किसी दूसरी ओर खोजकर देखना होगा।

अपूर्व बोला, आज क्या सभी लोग यही बात नहीं कह रहे हैं?

कहने दो। जो ग़लत है वह तैंतीस करोड़ आदमी मिलकर कहें तो भी ग़लत ही है। वरना इस शिक्षित भद्र जाति से बढ़कर लांछित, अपमानित, दुर्दशाग्रस्त समाज बंग देश में दूसरा नहीं है। उस पर मिथ्या कलंक का और बोझ लादकर उसे क्यों डुबो देना चाहते हो? क्यों सोचते हो कि विदेशों की सभी युक्तियां और सभी समस्याएं अपने देश में भी लागू हो सकती है? बाहर का अनाचार ही जब पल-पल में सर्वनाश लाता चला जा रहा है तब फिर अंत:विद्रोह की सृष्टि किस लिए करना चाहते हो? देश असंतोष से भर गया है। स्नेह और श्रद्धा के बंधन क्यों चूर-चूर हो गए हैं-जानते हो? तुम्हीं इस आदमियों के दोष से, शिक्षितों के विरुद्ध शिक्षितों के आक्रमण से। शशि, एक दिन तुमको भी मैंने यह काम करने का निषेध किया था, याद है? अपने विरुद्ध होने, अपना दुर्नाम घोषित करने में एक निरपेक्ष स्पष्टवादिता का दम्भ है। एक तरह की सस्ती ख्याति भी एक मुंह से दूसरे मुंह तक फैलती चली जाती है। लेकिन यह केवल ग़लत बात नहीं, झूठ भी है। उन लोगों का हित करना चाहते हो तो जाकर करो। लेकिन एक के विरुद्ध दूसरे को उत्तेजित करके नहीं। दूसरों पर कलंक लगाकर नहीं। विश्व के सामने उसको हास्यास्पद बनाकर नहीं। हो सकता है - वह दिन आ पहुंचे। लेकिन अभी तो उसमें देर है।

सभी चुप रहे।

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