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पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


डॉक्टर ने उसका शरीर छूकर कहा, तुम्हारी बात सच हो।

अपूर्व ने दृढ़ता भरे स्वर में कहा, अब से मैं देश के काम में, दस आदमियों के काम में, दीन दुखियों के काम में जीवन लगाऊंगा। कलकत्ते में मेरा घर है। शहर में इतना बड़ा हुआ हूं। लेकिन शहर के साथ अब मेरा कुछ नहीं रहा। अब से ग्राम-सेवा ही मेरा एकमात्र व्रत होगा। किसी दिन कृषि-प्रधान भारत के गांव ही प्राण थे। आज उनका ध्वंस होता चला जा रहा है। भद्र जाति के लोग उनको छोड़कर शहरों में चले गए हैं। वहीं से वह उन पर दिन-रात शासन करते हैं और शोषण करते हैं। इसके सिवा गांवों से उन लोगों ने कोई संबंध नहीं रखा है न रखें। लेकिन चिरकाल से जो लोग इस देश के मुख का अन्न और शरीर ढंकने के वस्त्र सुलभ करते आ रहे हैं वह किसान ही आज अन्नहीन, विद्याहीन और निरुपाय होकर मृत्यु पथ पर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं अब से मैं उन्हीं की सेवा में अपना जीवन दूंगा और भारती ने भी जी-जान से हमें सहायता देने का वचन दिया है। गांव-गांव में पाठशालाएं खोलकर उनके बच्चे-बच्चियों को शिक्षित बनाने का भार वह अपने ऊपर लेंगी। मेरा संन्यास देश के लिए है डॉक्टर, अपने लिए नहीं।

डॉक्टर ने कहा, अच्छा प्रस्ताव है।

उनके मुंह से केवल दो शब्दों के निकलने की आशा किसी ने नहीं कि थी। भारती ने उदास होकर कहा, और एक तरह से सोचा जाए तो यह काम तुम्हारा ही है भैया। इस कृषि-प्रधान देश में जब तक किसान बड़े नहीं होते तब तक कुछ भी नहीं हो सकता।

डॉक्टर ने कहा, मैंने प्रतिवाद तो नहीं किया भारती।

तुमने उत्साह भी तो प्रदर्शित नहीं किया भैया।

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