लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> परसाई के राजनीतिक व्यंग्य

परसाई के राजनीतिक व्यंग्य

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :296
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9709
आईएसबीएन :9781613014189

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

194 पाठक हैं

राजनीतिक विषयों पर केंद्रित निबंध कभी-कभी तत्कालीन घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए अपने पाठ की माँग करते हैं लेकिन यदि ऐसा कर पाना संभव न हो तो भी परसाई की मर्मभेदी दृष्टि उनका वॉल्तेयरीय चुटीलापन इन्हें पढ़ा ले जाने का खुद में ही पर्याप्त कारण है।

राधेश्यामजी खुद यह कथा बाँचते थे और सुननेवालों की भीड़ लग जाती थी। 'राधेश्याम रामायण' पोथी भी छप गई थी और खूब बिकती थी। तरह-तरह के कथावाचक और प्रवचनकर्ता मैंने देखे सुने हैं। अधिकांश पेट पालने के लिए अध्यात्म बघारते हैं। मैंने विरला ही कोई देखा, जो समाजमुखी हो, जो समाज सुधार पर प्रवचन करता हो। उनमें यह चेतना ही नहीं है, न दायित्व बोध। फिर यथास्थिति को कायम रखने से उनका लाभ है। इनमें सब संन्यासी नहीं होते। गृहस्थ होते हैं। कमाने के लिए कथावाचन या प्रवचन की यात्रा पर निकलते हैं। जो मिल जाता है, उसे लेकर परिवार में पहुँच जाते हैं।

एक का प्रवचन मैंने रात को सुना। दूसरे दिन मैं जब दवा की दुकान पर बैठा था वहीं स्वामीजी आए। दो दर्जन 'पर्गोलेक्स (दस्त की दवा) दे दो। मैंने कहा - इकट्ठी दो दर्जन गोलियाँ क्या करेंगे स्वामीजी? उन्होंने बिना संकोच कहा - पेट पालते हैं भैया। प्रवचनों से शहरों में कुछ खास मिलता नहीं। दवाइयाँ खरीदते हैं और उनको पीसकर भभूत में मिला देते हैं। फिर गाँव जाते हैं। माताएँ बच्चे की मामूली बीमारी की शिकायत करती हैं। हम उन्हें तीन खुराक भभूत दे देते हैं। कहते हैं - तीन दिन के अंतर से खिलाना। बच्चा ठीक हो जाएगा। फिर जाते हैं। लड़का ठीक हो जाता है। माता हमें दान देती है। इस तरह गुजारा करते हैं।

पिछले कुछ सालों से प्रवचनों के विषय और शैली और उद्देश्य बदले हैं। कुछ प्रवचनकारों के, सबके नहीं। बाकी तो वही कथा, अध्यात्म, दृष्टांत, पुराण के प्रवचन करते हैं। पर जब से राजनीतिक उद्देश्य के लिए धर्म का उपयोग शुरू हुआ, प्रवचनकर्ता धर्म के बहाने राजनीति बोलते हैं। राजनीतिज्ञ हैं नहीं तो कच्ची राजनीति बोलते हैं। सांप्रदायिक द्वेष की राजनीति बोलते हैं; ये अक्सर ओछा, कुरुचिपूर्ण और भद्दा बोलते हैं। अशिष्ट बोलते हैं। ऐसे प्रवचन करनेवालों में दो देवियाँ, जिन्होंने संन्यास ले लिया विशेष हैं। ये द्वेष का जहर उगलती हैं, कुरुचिपूर्ण आक्रमण दूसरे संप्रदाय पर करती हैं। ये तर्कहीन बोलती हैं। इतिहास का अज्ञान बोलती हैं। लेकिन जबान छुरी है।

अभी मेरे शहर में एक प्रवचनकर्ता आए। चार प्रवचन अच्छे किए। आध्यात्मिक प्रवचन। पाँचवें दिन उन्हें राजनीति सूझी और वे ऊटपटाँग बोले। कहा - जवाहरलाल नेहरू ने एक औरत की मुहब्बत में देश के टुकड़े करवा दिए। इस पर शोर हुआ। दो कांग्रेसी महिलाओं ने उन पर चप्पलें फेंकी। मामला तूल पकड़ता, पर दूसरे दिन सुबह स्वामीजी शहर छोड़ गए। ये स्वामी तो अधकचरे हैं। पर काफी संख्या में भगवा वस्त्रवाले स्वामियों को नफरत की राजनीति का शिक्षण दिया गया है। वे स्वामी तैयार सांप्रदायिक नफरत और द्वेष के प्रवचन करते हैं।


0 0 0

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

लोगों की राय

No reviews for this book